नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों के संतुलन से ही राष्ट्र का समग्र विकास संभव है। उन्होंने यह बात भारत मंडपम में आयोजित एक सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर कही, जिसका विषय था-‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आदिवासी जीवन का परिवर्तन, साथ ही भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण।’
उपराष्ट्रपति ने ‘विकास भी, विरासत भी’ के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और परंपरागत ज्ञान का समन्वय ही स्थायी और समावेशी विकास की कुंजी है।
उन्होंने आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को अमूल्य बताते हुए कहा कि यह ज्ञान जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सदियों से इन समुदायों ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर रखा है, जिसे संरक्षित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।












