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गोद लेने पर भी मिल जाएगी मैटरनिटी लीव, सुप्रीम कोर्ट ने हटाया 3 महीने वाला नियम

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ‘मातृत्व अवकाश’ को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। इसमें कहा कि अब बच्चा गोद लेने वाली सभी माताओं को मातृत्व अवकाश मिल सकेगा। शीर्ष कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उस कानूनी प्रावधान को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत 3 महीने तक के बच्चे को गोद लेने पर ही अवकाश मिलने की व्यवस्था की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने कानूनी नियम को गैर-संवैधानिक घोषित कर दिया और इसे समानता के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 14) का हनन माना है। बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो सभी गोद लेने वाली माताएं गोद लेने की तारीख से 12 हफ्ते की छुट्टी की हकदार होंगी। कोर्ट ने कहा कि पुराना नियम मां और बच्चे दोनों के लिए भेदभाव वाला है।

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कोर्ट ने यह भी कहा है कि मातृत्व एक मौलिक मानव अधिकार है। उसे इस तरह की सीमा में नहीं बांधा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने कहा, ‘गोद लेना परिवार बनाने का एक उतना ही अच्छा तरीका है… बायोलॉजिकल फैक्टर सिर्फ परिवार के मूल्यों और हकों को तय नहीं कर सकते।’ बेंच ने गोद लिए गए बच्चे के अधिकार की चर्चा अपने फैसले में की है। उन्होंने कहा है कि मां का प्यार पाना बच्चे का अधिकार है। उसे नए परिवार से जुड़ने में समय लगता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बच्चे और अभिभावकों को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है, लेकिन यह कानून उसका भी उल्लंघन करता है।

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केंद्र सरकार से विचार करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सामाजिक कल्याण के तरीके के तौर पर मातृत्व अवकाश शुरू करने पर विचार करे। याचिकाकर्ता ने मूल रूप से 1961 के मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट 1961 की धारा 5(4) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 2020 में लागू सोशल सिक्योरिटी कोड ने 1961 के कानून की जगह ले ली है। इसकी धारा 60(4) में वही लिखा है, जो 1961 के कानून की धारा 5(4) में था।

कोर्ट ने रद्द करदी धारा

2020 के सोशल सिक्योरिटी कोड की धारा 60(4) में बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को अधिकतम 12 सप्ताह की मातृत्व अवकाश का प्रावधान है, मगर यह लाभ उन्हीं महिलाओं के लिए है जिन्होंने 3 महीने से कम आयु का बच्चा गोद लिया हो। इसी धारा को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया।

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