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अरुणाचल प्रदेश में जगहों का नाम बदलकर चीन क्या हासिल करना चाहता है?

इस महीने चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 23 जगहों के नाम फिर से बदल दिए जिस पर मोदी सरकार ने इस पर पूरी तरह से सख्ती दिखाई और इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह चीन की बढ़ती हुई जमीन को हड़पने की सोच को दिखाता है। चीन आर्थिक सहयोग की बात तो करता है लेकिन असल में अपना जमीन का दावा सबसे ऊपर रखता है।

भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा 150 अरब डॉलर से ज्यादा है। इसमें हांगकांग भी शामिल है। 2017 के डोकलाम विवाद के बाद से चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 82 शहरों और इलाकों के नाम बदल दिए हैं। ताजा 23 नाम 10 अप्रैल 2026 को जारी किए गए।

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क्या बोला विदेश मंत्रालय

विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि नाम बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती लेकिन यह चीन की तरफ से दबाव बनाने की रणनीति है। चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिण तिब्बत’ कहकर अपना हिस्सा बताता है। याद रहे, 1950 में चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया था। उस समय नेहरू सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया था, जिसे आज कई लोग बड़ी गलती मानते हैं।

कुछ सेवानिवृत्त और मौजूदा अधिकारी चीन के साथ ज्यादा आर्थिक संबंध बढ़ाने की सलाह देते हैं लेकिन वही लोग भारत-अमेरिका संबंधों पर सवाल उठाते हैं। वे चीन की बार-बार जमीन पर कब्जा करने की कोशिश, सैन्य विस्तार और पाकिस्तान के साथ बढ़ते गठबंधन को नजरअंदाज करते हैं। जबकि अमेरिका की छोटी-छोटी गलतियों को बड़े रूप में पेश करते हैं।

ये लोग चीन-पाकिस्तान के मजबूत सैन्य और नागरिक संबंधों को अनदेखा करते हैं, लेकिन अमेरिका-पाकिस्तान संबंध को भारत के साथ धोखा बताते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन अधिकारियों के बच्चे पढ़ने और नौकरी करने के लिए पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका जाते हैं, न कि चीन या रूस।

चुंबी घाटी में सक्रिय है चीन

चीनी सेना (PLA) चुंबी घाटी में बहुत सक्रिय है और सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास अमुचु नदी के किनारे विस्तार करने की कोशिश कर रही है। चीन पाकिस्तान को युआन क्लास पनडुब्बी, फ्रिगेट जहाज और निगरानी पोत दे रहा है। साथ ही पाकिस्तान को 3000 किलोमीटर लंबी मिसाइल बनाने में मदद कर रहा है, जो पूरे भारत को कवर कर सके।

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2020 में जब चीनी सेना ने पूर्वी लद्दाख में हमला किया, तब भारत को सैन्य मदद के लिए कोई देश आगे नहीं आया। आज पाकिस्तान अमेरिका और चीन दोनों के साथ संबंध रख रहा है। इसलिए भारत को दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर तैयारी रखनी होगी। चीन 1959 की लाइन को पूर्वी लद्दाख में छोड़ने को तैयार नहीं है और अरुणाचल पर अपना दावा जारी रखे हुए है।

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