लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोक अदालत या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) किसी पति-पत्नी को तलाक नहीं दे सकते। अदालत ने साफ किया कि तलाक की कानूनी डिक्री जारी करने का अधिकार केवल परिवार न्यायालय (फैमिली कोर्ट) के पास है।
यह मामला उन्नाव जिले से जुड़ा है। एक महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि वर्ष 2018 में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से उसके और उसके पति के बीच समझौता कराया गया था। बाद में पति ने उस समझौते को तलाक मानते हुए दूसरी शादी कर ली। महिला ने अदालत से कहा कि उन्हें किसी अदालत से कभी तलाक नहीं मिला, इसलिए समझौते को तलाक नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि लोक अदालत का काम केवल दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का होता है। वह किसी मामले में अंतिम कानूनी फैसला नहीं दे सकती। खासकर विवाह और तलाक जैसे मामलों में निर्णय देने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को ही है।
अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं, तब भी उन्हें कानून के तहत परिवार न्यायालय से तलाक की डिक्री लेनी होगी। केवल समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर देने से विवाह समाप्त नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की कार्यवाही पर नाराजगी जताते हुए कहा कि समझौते में यह लिखना कि दोनों पक्ष भविष्य में पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र हैं, कानून के अनुरूप नहीं है। जब तक किसी सक्षम अदालत से तलाक की डिक्री जारी न हो जाए, तब तक पति-पत्नी का वैवाहिक संबंध बना रहता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में आज तक किसी न्यायालय ने तलाक का आदेश पारित नहीं किया है। ऐसे में पति द्वारा समझौते को तलाक मानना सही नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने महिला को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की छूट दी। साथ ही आदेश की प्रति प्रदेश की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजने का निर्देश दिया, ताकि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि लोक अदालतें लोगों को जल्दी और सस्ता न्याय दिलाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं, लेकिन उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए।












