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परिवार नियोजन का बोझ महिलाओं पर ही क्यों? 99.5 फीसदी पुरुषों को नसबंदी से ऐतराज

भारत में पुरुष नसबंदी से बचते हैं और परिवार नियोजन की जिम्मेदारियां, स्त्रियों पर ही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 में भी इन आंकड़ों में कोई सुधार नजर नहीं आया है। देश की 56.9 प्रतिशत महिलाओं ने फीमेल स्टेरलाइजेशन कराई है। परिवार नियोजन की जिम्मेदारी, भारत में महिला भरोसे ही है। पुरुषों में वेसेक्टॉमी का प्रतिशत शून्य के करीब है। 0.5 प्रतिशत पुरुष ही ऐसे हैं, जिन्होंने नसबंदी का विकल्प चुना है। यह तब हो रहा है, जब हम 21वीं सदी में हैं।

15 से 49 साल की विवाहित महिलाओं के आंकड़ों को शामिल करके यह सर्वे किया गया है। देश की 60.3% महिलाएं किसी न किसी तरीके का परिवार नियोजन इस्तेमाल कर रही हैं। इनमें 57.6% आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि सिर्फ 2.7% पारंपरिक तरीकों पर भरोसा कर रही हैं।

सबसे ज्यादा महिलाएं ही नसबंदी कराती हैं। 15 से 49 साल के बीच की 49 फीसदी महिलाओं ने नसंबदी कराई है। पुरुष नसबंदी शून्य के बराबर है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की नसंबदी के आंकड़े 62.8% तक पहुंच गए हैं। परिवार नियोजन में आधुनिक तरीकों का दबदबा है, लेकिन ज्यादातर बोझ महिलाओं पर ही है क्योंकि पुरुष नसबंदी लगभग नहीं हो रही है।

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नसंबदी से पुरुषों को है ऐतराज

पुरुष नसबंदी, महिला नसबंदी की तुलना में कहीं ज्यादा आसान होती है फिर भी सामाजिक कलंक, अज्ञानता और नपुंसकता के डर से पुरुष नसबंदी से बचते हैं। पुरुष नसबंदी के आंकड़े न तो शहर में बेहतर हैं, न ही ग्रामीण इलाकों में।

पुरुष, नसबंदी को सहज तौर पर स्वीकार ही नहीं कर पाते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 से 2021 के बीच 2 पॉइंट का सुधार हुआ है। साल 2023-24 में सिर्फ 0.5 प्रतिशत पुरुषों ने नसबंदी कराई, जबकि साल 2019 और 2021 के बीच यह आंकड़ा 0.3 प्रतिशत था। आंकड़ों में थोड़ा सुधार, अब नजर आया है।

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क्यों नसबंदी से बचते हैं पुरुष?

आयशा हेल्थ केयर के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जावेद अख्तर ने कहा, ‘सांस्कृतिक मान्यताओं और पारंपरिक सोच की वजह से परिवार नियोजन में महिलाओं को ही विकल्प मान लिया जाता है। ग्रामीण इलाकों में यह स्थिति और भी खराब है। यहां 62.8 प्रतिशत महिलाओं ने नसबंदी कराई है, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 49.1 प्रतिशत है। पिछले सर्वे (NFHS-5) की तुलना में फीमेल स्टेरलाइजेशन में थोड़ी कमी आई है। यह 0.5 प्रतिशत कम हुआ है।’

डॉ. जावेद अख्तर, मैनेजिंग डायरेक्टर, आयशा हेल्थ केयर:-
पुरुषों की नसबंदी को वेसेक्टॉमी कहते हैं। यह बेहद छोटी सी प्रक्रिया है। इसमें कोई चीरा नहीं लगता और यह आधे घंटे से भी कम समय में हो जाती है। पुरुष, ऑपरेशन के बाद उसी दिन घर जा सकते हैं और एक सप्ताह के भीतर ही मेहनत वाले काम शुरू कर सकते हैं।

क्यों नसबंदी से डरते हैं पुरुष?

डॉ. जावेद अख्तर ने कहा कि जागरुकता न होना, पुरुष नसबंदी की सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा, ‘लोगों को लगता है कि अगर नसबंदी करा ली तो वे नपुसंक हो जाएंगे, मर्द नहीं रहेंगे। सच्चाई यह है कि नपुंसकता या सेक्स पावर पर कोई असर नहीं पड़ता। नसबंदी खोली भी जा सकती है, इस प्रक्रिया को ट्यूबल रिवर्स कहते हैं।’

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महिला नसंबदी जटिल, पुरुष नसबंदी आसान, फिर भी…

डॉ. जावेद अख्तर ने कहा, ‘महिलाओं की नसबंदी ज्यादा मुश्किल होती है। पेट के अंदर सर्जरी करनी पड़ती है। महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब्स को ब्लॉक किया जाता है, जिससे अंडाशय से निकलने वाले अंडे शुक्राणु से नहीं मिल पाते और महिलाएं गर्भवती नहीं होती हैं। ऑपरेशन की रिकवरी में दो हफ्ते लग सकते हैं। अक्सर संक्रमण, ज्यादा खून बहना और दर्द की समस्याएं बनी रहती हैं।’

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कैसे हालात सुधर सकते हैं?

डॉ. जावेद अख्तर ने कहा, ‘शहर हों या गांव, लोग मान लेते हैं कि उनकी महिला पार्टनर ही नसबंदी कराएगी, अगर उन्होंने करा ली तो वंश कैसे चलेगा, लोग मजाक उड़ाएंगे। यह मजाक नहीं, अपने साथी को सम्मान देने की बात है। हैरान करने वाली बात यह है कि कई महिलाएं ही पति को ऐसा नहीं करने देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि पति इससे कमजोर हो जाएंगे, उनकी यौन क्षमताएं प्रभावित होंगी और सेक्स लाइफ खराब हो जाएगी। हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। पुरुषों को सहजता से परिवार नियोजन अपनाना चाहिए। देश में सेक्स एजुकेशन की हालत खराब है, इसे सुधारने की जरूरत है।’

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