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आखिर क्यों साइडलाइन हुए Akash Anand? 2027 से पहले Mayawati का सबसे बड़ा गेम, BSP का ब्राह्मण प्लान!

एक तरफ… 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। मायावती लगातार बैठकें कर रही हैं… उम्मीदवार तय किए जा रहे हैं…जातीय समीकरण बिछाए जा रहे हैं…ब्राह्मणों को संदेश भेजे जा रहे हैं…ओबीसी समाज से समर्थन मांगा जा रहा है…लेकिन…इस पूरी तस्वीर में एक चेहरा ऐसा है…जो कभी बसपा का भविष्य माना जाता था…लेकिन आज लगभग गायब है। नाम है… आकाश आनंद। वही आकाश आनंद… जिन्हें कभी मायावती ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बताया था…वही आकाश… जिन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा की सबसे आक्रामक रैलियां की थीं… वही आकाश… जिन्हें देखकर लाखों दलित युवाओं को लगा था कि बसपा अब नई पीढ़ी के हाथों में जाने वाली है। लेकिन आज… 2027 के सबसे अहम चुनाव की तैयारियां चल रही हैं… और आकाश आनंद कहीं दिखाई नहीं दे रहे। आखिर क्यों?

क्या मायावती का आकाश आनंद से भरोसा टूट चुका है? क्या पार्टी के अंदर कुछ बड़ा बदल चुका है? या फिर… ये एक ऐसा राजनीतिक दांव है… जिसका असली मकसद अभी किसी को समझ नहीं आ रहा? ये वो सवाल हैं जो इन दिनों बसपा समर्थकों के बीच घूम रहे हैं। और इसी के साथ एक और सवाल…जब पूरा देश ओबीसी राजनीति की बात कर रहा है… जब अखिलेश यादव PDA की बात कर रहे हैं… जब राहुल गांधी जाति जनगणना और ओबीसी प्रतिनिधित्व की बात कर रहे हैं… जब बीजेपी भी पिछड़े वर्ग पर पूरा फोकस कर रही है…तो आखिर… मायावती फिर से ब्राह्मण कार्ड क्यों खेल रही हैं? क्या 2007 वाला जादू… 2027 में दोबारा चल सकता है? या फिर बसपा अपने सबसे बड़े राजनीतिक इम्तिहान की तरफ बढ़ रही है?

अगर उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी एक चुनाव को “गेम चेंजर” कहा जाए…तो वह था…2007। उस चुनाव में सिर्फ सरकार नहीं बदली थी… राजनीति करने का तरीका बदल गया था। क्योंकि पहली बार…एक ऐसी पार्टी…जिसे सिर्फ दलितों की पार्टी कहा जाता था…उसने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ लिया। और देखते ही देखते… बहुजन समाज पार्टी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। उस समय राजनीति के एक्सपर्ट्स ने इसे नाम दिया… सोशल इंजीनियरिंग।

एक तरफ दलित वोट… दूसरी तरफ ब्राह्मण वोट… बीच में सर्वजन की राजनीति। यही वह फार्मूला था… जिसने मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन… राजनीति में कोई भी फार्मूला हमेशा नहीं चलता। समय बदला…वोटर बदले… समीकरण बदले… और बसपा भी बदलती चली गई। 2012… सत्ता चली गई। 2014… लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला। देश की सबसे बड़ी दलित पार्टी…0 सीट।

फिर आया 2017… जहां बीजेपी की आंधी में बसपा और कमजोर हो गई। 2019 में… मायावती ने एक ऐसा फैसला लिया… जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने…गेस्ट हाउस कांड को पीछे छोड़ते हुए… अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया। समाजवादी पार्टी और बसपा… जो कभी एक-दूसरे की सबसे बड़ी राजनीतिक दुश्मन थीं…वे साथ आ गईं। नतीजा… बसपा के 10 सांसद जीत गए। लेकिन… यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चली। चुनाव खत्म…और गठबंधन भी खत्म।

इसके बाद आया 2022। और यह चुनाव…बसपा के लिए सबसे बड़ा झटका बन गया। पूरे उत्तर प्रदेश में…बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी। एक ऐसी पार्टी… जिसने कभी अपने दम पर सरकार बनाई थी… वह एक सीट पर सिमट गई। यहीं से सवाल उठने लगे… क्या बसपा खत्म हो रही है? या… मायावती किसी बड़े दांव की तैयारी कर रही हैं? इसी बीच सामने आया एक नया चेहरा… जब बसपा लगातार चुनाव हार रही थी…तब पार्टी के अंदर एक नया चेहरा तेजी से उभर रहा था।

आकाश आनंद। युवा…पढ़े-लिखे…आधुनिक सोच वाले… और सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय। जहां बसपा को हमेशा पारंपरिक राजनीति करने वाली पार्टी माना जाता था… वहीं… आकाश आनंद पहली बार डिजिटल राजनीति लेकर आए। उन्होंने सोशल मीडिया पर पार्टी की मौजूदगी बढ़ाई। युवाओं से सीधे संवाद किया। रैलियों में आक्रामक भाषण दिए। और धीरे-धीरे… लोगों को लगने लगा…कि मायावती अब पार्टी की कमान अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी कर रही हैं।

इतना ही नहीं… मायावती ने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना उत्तराधिकारी भी बताया। यहीं से… बसपा समर्थकों के मन में उम्मीद जगी। उन्हें लगा… अब पार्टी में नई ऊर्जा आएगी। नई सोच आएगी। और शायद… पुराने वोट बैंक के साथ नए युवा मतदाता भी जुड़ेंगे। लेकिन…जो आगे हुआ…उसने सबको चौंका दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान… आकाश आनंद के कुछ बयान विवादों में आ गए। इसके बाद… मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।

यह फैसला…बसपा कार्यकर्ताओं के लिए किसी झटके से कम नहीं था। हालांकि…कुछ समय बाद…उन्हें वापस भी ले लिया गया। लेकिन… जो बात सबसे ज्यादा चर्चा में रही… वह यह थी कि…उन्हें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राजनीति से लगभग दूर रखा गया। आज… जब 2027 के चुनाव की तैयारी अपने चरम पर है…जब टिकट बांटे जा रहे हैं…जब संगठन तैयार किया जा रहा है… जब हर दिन रणनीति बन रही है…तब भी… आकाश आनंद की कोई बड़ी भूमिका दिखाई नहीं देती।

यहीं से…राजनीतिक गलियारों में सवाल शुरू हो गए। क्या मायावती अब भी उन पर भरोसा करती हैं? अगर करती हैं… तो फिर उन्हें सामने क्यों नहीं लाया जा रहा? और अगर भरोसा नहीं करतीं…तो फिर उन्हें पार्टी में वापस क्यों लिया गया? यानी… सवाल ज्यादा हैं…लेकिन जवाब अभी भी बहुत कम। इन सवालों के बीच एक और सवाल बहुत पूछा जा रहा है, वो ये कि क्या 2007 वाली सोशल इंजिनियरिंग 2027 में काम आएगी?

बहुत लोग कहते हैं कि मायावती ने सिर्फ दलित वोट के दम पर सरकार बनाई थी। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। कांशीराम के समय तक बसपा “बहुजन” की राजनीति करती थी। लेकिन 2007 आते-आते मायावती ने एक बड़ा बदलाव किया। उन्होंने कहा… “बहुजन से सर्वजन।” यानी… दलित भी… ब्राह्मण भी… वैश्य भी… ओबीसी भी… यही सोशल इंजीनियरिंग थी। और इसी रणनीति के सबसे बड़े चेहरे बने… सतीश चंद्र मिश्रा। उन्होंने पूरे यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन किए।

नारा दिया गया…”हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।” और इसका असर हुआ। ब्राह्मण वोट का बड़ा हिस्सा बीएसपी के साथ आया। दलित वोट पहले से था। और दोनों के गठजोड़ ने इतिहास लिख दिया। लेकिन फिर सब बिखर क्यों गया? 2012 आते-आते… एंटी इनकंबेंसी बढ़ी। भ्रष्टाचार के आरोप लगे। विकास पर सवाल उठे। और समाजवादी पार्टी सत्ता में आ गई। इसके बाद… बीजेपी ने 2014 से नई सोशल इंजीनियरिंग शुरू कर दी। उसने सिर्फ अपर कास्ट नहीं… बल्कि गैर-यादव ओबीसी… गैर-जाटव दलित… और हिंदुत्व के बड़े नैरेटिव को एक साथ जोड़ दिया।

यहीं बीएसपी का वोट बैंक धीरे-धीरे खिसकने लगा। आज ब्राह्मण वोट आखिर जाएगा कहां? यही सबसे बड़ा सवाल है। बीजेपी अभी भी ब्राह्मणों का सबसे बड़ा राजनीतिक विकल्प मानी जाती है। लेकिन… बीते कुछ सालों में… ब्राह्मण समाज के एक हिस्से में नाराजगी की चर्चा भी होती रही है। कभी कानून व्यवस्था… कभी टिकट बंटवारा… कभी राजनीतिक प्रतिनिधित्व… इन मुद्दों पर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है।

इसी मौके को मायावती भुनाना चाहती हैं। वो लगातार कह रही हैं… ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा सम्मान… सबसे ज्यादा भागीदारी…बीएसपी सरकार में मिली थी। लेकिन सिर्फ बयान देने से वोट मिल जाते हैं क्या? यहीं सबसे बड़ी चुनौती है। 2007 में… बीएसपी के पास सतीश चंद्र मिश्रा जैसे बड़े चेहरे थे। कई ब्राह्मण नेता पार्टी में थे। आज तस्वीर अलग है। पार्टी में वैसी ब्राह्मण नेतृत्व की ताकत दिखाई नहीं देती। मायावती टिकट देने की बात जरूर कर रही हैं… लेकिन क्या सिर्फ टिकट देने से पूरा समाज साथ आ जाएगा? यही देखने वाली बात होगी।

दिलचस्प बात ये है…एक तरफ बीएसपी ब्राह्मणों को साध रही है… दूसरी तरफ मायावती लगातार ओबीसी समाज से भी अपील कर रही हैं। उनका कहना है… दूसरी पार्टियों ने ओबीसी को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया… जबकि बसपा ने सत्ता और संगठन दोनों में भागीदारी दी। यानी… मायावती सिर्फ दलित+ब्राह्मण नहीं… बल्कि दलित+ब्राह्मण+ओबीसी… तीनों का नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।

लेकिन रास्ता आसान नहीं है क्योंकि सामने…समाजवादी पार्टी का PDA फार्मूला है। पीडीए…यानी…पिछड़ा…दलित…अल्पसंख्यक…2024 के लोकसभा चुनाव में…इस फार्मूले की काफी चर्चा रही। दूसरी तरफ… कांग्रेस भी सामाजिक न्याय की राजनीति को तेज कर रही है। और बीजेपी… अपने मजबूत संगठन…सरकारी योजनाओं… और हिंदुत्व के एजेंडे के साथ मैदान में है। ऐसे में अगर बसपा 2027 को गंभीरता से लड़ रही है तो तो उसका सबसे बड़ा युवा चेहरा आखिर कहां है?

क्या पार्टी उन्हें सही समय पर लॉन्च करेगी? या फिर उन्हें पूरी तरह सीमित रखेगी? क्योंकि… आज का चुनाव सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं जीतते। आज चुनाव…सोशल मीडिया…युवा वोट…डिजिटल नैरेटिव… और लगातार दिखाई देने वाली राजनीति से भी जीतते हैं। और यहां… आकाश आनंद बीएसपी के लिए सबसे बड़ा हथियार हो सकते हैं। राजनीति में टाइमिंग सबसे बड़ी चीज होती है। हो सकता है… आकाश आनंद को जानबूझकर अभी पीछे रखा गया हो। और चुनाव के करीब… उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर मैदान में उतारा जाए।

क्योंकि… अगर अभी सारी रणनीति खोल दी जाए… तो विरोधी भी उसी हिसाब से तैयारी करेंगे। लेकिन… अगर आखिरी वक्त में नया चेहरा सामने आता है… तो उसका मनोवैज्ञानिक असर अलग हो सकता है। हालांकि… ये सिर्फ एक राजनीतिक संभावना है। इस पर अभी तक पार्टी की तरफ से कोई आधिकारिक संकेत नहीं है। 2027 का चुनाव मायावती के लिए सिर्फ सत्ता का चुनाव नहीं होगा। यह तय करेगा… क्या बीएसपी फिर से उत्तर प्रदेश की मुख्य लड़ाई में लौट सकती है? या… वह एक क्षेत्रीय और सीमित प्रभाव वाली पार्टी बनकर रह जाएगी?

अगर बीएसपी अच्छा प्रदर्शन करती है… तो आकाश आनंद का भविष्य भी मजबूत होगा। लेकिन… अगर पार्टी लगातार कमजोर होती गई… तो सबसे ज्यादा असर उसी नई पीढ़ी पर पड़ेगा…जिसे मायावती अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी मानती रही हैं। तो अब सबसे बड़ा सवाल आपके लिए… क्या मायावती का 2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग मॉडल 2027 में फिर सफल हो सकता है? क्या ब्राह्मण वोट फिर बीएसपी की तरफ लौटेगा? क्या आकाश आनंद को आखिरकार बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी? या… उत्तर प्रदेश की राजनीति अब पूरी तरह बदल चुकी है?

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