HomeHealth & Fitnessसंपादकीय: सोनम वांगचुक का संघर्ष, देश और दुनिया की जरूरत

संपादकीय: सोनम वांगचुक का संघर्ष, देश और दुनिया की जरूरत

दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल एक जनहित याचिका ने एक बार फिर सोनम वांगचुक की सेहत और उनके संघर्ष को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। जलवायु कार्यकर्ता, इंजीनियर और लद्दाख के लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर हैं। 

वे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जिसके पीछे नीट, यूजी परीक्षा में बड़े पैमाने पर पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियां हैं। इस जनहित याचिका में याचिकाकर्ता ने कोर्ट से अपील की है कि वांगचुक को अस्पताल ले जाकर आवश्यक पोषण और दवाइयों से उनका जीवन बचाया जाए, क्योंकि उनका वजन 8.5 किलो घट चुका है और उनकी हालत तेजी से बिगड़ रही है। 

यह याचिका महज एक व्यक्ति की सेहत की चिंता नहीं है। यह उस मूल्य की रक्षा का सवाल है जिसके लिए वांगचुक पिछले दो दशकों से लड़ रहे हैं। शिक्षा, पर्यावरण और लोकतंत्र की सार्थकता। वांगचुक कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। वे लद्दाख के बर्फीले रेगिस्तान में ‘आइस स्टूपा’ जैसी अभिनव तकनीक विकसित कर जल संरक्षण का अनोखा मॉडल खड़ा करने वाले इंजीनियर हैं। उन्होंने पारंपरिक लद्दाखी शिक्षा को आधुनिक जरूरतों से जोड़कर सैकड़ों युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया। 

उनकी ‘स्टूडेंट्स एजुकेशन एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ पहल ने दिखाया कि शिक्षा किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर जीवन-कौशल और पर्यावरणीय समझ पर आधारित होनी चाहिए।वांगचुक देश के लिए क्यों आवश्यक हैं? लद्दाख भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित संवेदनशील क्षेत्र है। जलवायु परिवर्तन यहां सबसे तेजी से असर दिखा रहा है—हिमनद पिघल रहे हैं, पानी की कमी बढ़ रही है और पारंपरिक कृषि-चरागाह प्रभावित हो रहे हैं। वांगचुक ने इन मुद्दों को वैश्विक मंच पर उठाया। 

कार्बन उत्सर्जन सम्मेलनों में उनका स्वर विकासशील देशों की आवाज बनता है। वे बताते हैं कि हिमालय न सिर्फ भारत का ‘वाटर टावर’ है, बल्कि पूरे एशिया का। अगर हम लद्दाख की आवाज दबाते हैं, तो हम अपनी भविष्य की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। शिक्षा क्षेत्र में भी उनका योगदान अनमोल है। नीट पेपर लीक जैसी घटनाएं युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हैं। 

वांगचुक का अनशन इस सड़ांध के खिलाफ नैतिक प्रतिरोध है। जब सरकारी तंत्र परीक्षा व्यवस्था सुधारने में नाकाम रहता है, तब एक व्यक्ति का उपवास पूरे समाज की चेतना जगाता है। यह गांधीवादी अहिंसक संघर्ष की याद दिलाता है कि जहां सत्याग्रही अपनी जान की बाजी लगाकर न्याय मांगता है। दुनिया के लिए क्यों ज़रूरी? आज जब जलवायु संकट गंभीर रूप ले चुका है, वांगचुक जैसे स्थानीय नायक, वैश्विक समाधान देते हैं। उनकी ‘पासिव हीटिंग’ और बर्फ संरक्षण की तकनीकें विकासशील देशों के लिए प्रासंगिक हैं। 

यदि हम उन्हें खो देते हैं, तो न सिर्फ एक आवाज दबेगी, बल्कि हिमालयी इकोसिस्टम की रक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष कमजोर होगा। जनहित याचिका में कहा गया है कि वांगचुक की मृत्यु ‘देश और दुनिया के लिए शर्म’ होगी। यह बयान अतिशयोक्ति नहीं, सच्चाई है। सरकार को चाहिए कि वह दमन की बजाय संवाद का रास्ता अपनाए। अनशनकर्ता को जबरन दूध पिलाना या अस्पताल में भर्ती करना अस्थायी समाधान है। असली समाधान शिक्षा सुधार, लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन नीतियों में है। अदालतों से अपेक्षा है कि वे न सिर्फ वांगचुक की जान बचाएं, बल्कि उनके मुद्दों पर गंभीर सुनवाई सुनिश्चित करें। 

वांगचुक का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को कुचला नहीं जा सकता। वे देश और दुनिया के लिए आवश्यक हैं क्योंकि वे हमें भविष्य की चुनौतियों से निपटने की प्रेरणा देते हैं। शिक्षा में पारदर्शिता, पर्यावरण में संरक्षण और राजनीति में नैतिकता। उनकी सेहत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यह समय है कि हम उनकी बात सुनें, उनके समाधानों को अपनाएं और उन्हें सहयोग दें। क्योंकि एक सोनम वांगचुक का बचना हजारों युवाओं को प्रेरित कर सकता है।

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