HomeHealth & Fitnessअलविदा ख़ामनेई: मर के जीना सिखा दिया तूने

अलविदा ख़ामनेई: मर के जीना सिखा दिया तूने

तनवीर जाफ़री                         
ईरान के सर्वोच्च नेता शहीद सैयद अली ख़ामनेई के बहुप्रतीक्षित अंतिम संस्कार की रस्म इन दिनों ईरान- इराक़ में अदा की जा रही है। विश्व के अब तक के सबसे बड़े अंतिम संस्कार के इस राजकीय शोक में भारत, पाकिस्तान, रूस, चीन,सऊदी अरब,अफ़ग़ानिस्तान सहित लगभग 100 देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। ग़ौरतलब है कि गत 28 फ़रवरी को पवित्र रमज़ान माह में अमेरिका व इस्राईल द्वारा किये गये कायराना हवाई हमले में सैयद अली ख़ामनेई ,उनकी बेटी बुशरा हुसैनी ख़ामेनेई व दामाद मिस्बाह अल-हुदा बाक़री उनकी 14 महीने की पोती ज़हरा मोहम्मदी गुल पायगानी  तथा ख़ामनेई के बेटे व वर्तमान सुप्रीम लीडर मुज्तबा ख़ामनेई की पत्नी सभी एक साथ शहीद हो गये थे। ईरान पर अमेरिका व इस्राईल द्वारा थोपे गये युद्ध में उलझे होने के कारण ख़ामनेई के अंतिम संस्कार की रस्म अब तक अदा नहीं की जा सकी थी। अब निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार संस्कार की रस्म की शुरुआत 3 जुलाई से हो चुकी है। 3 जुलाई को ईरान के उप गृह मंत्री ब्रिगेडियर जनरल अली अकबरपूर जमशीदियान द्वारा विदेशी गणमान्य लोगों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। इसके बाद तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला मस्जिद में 4 व 5 जुलाई का दो दिन का शोक समारोह आयोजित किया गया।  इसके बाद  5 जुलाई को मुख्य जनाज़े की नमाज़ अदा की गयी। 6 जुलाई को तेहरान में जनाज़े की अंतिम यात्रा निर्धारित समयानुसार सुबह 6 बजे शुरू होगी। अगले दिन यानी 7 जुलाई को ईरान के प्रमुख धार्मिक शहर क़ुम में भी अंतिम यात्रा निकाली जाएगी और यहाँ की प्रसिद्ध पवित्र जमकरान मस्जिद में नमाज़- ए-जनाज़ा अदा की जाएगी।                      

इसी तरह 8 जुलाई को इराक़ के नजफ़ और कर्बला में भी अंतिम यात्रा निकाली जायेगी। निर्धारित योजनानुसार इराक़ में 7 जुलाई की शाम शहीद ख़ामनेई का जनाज़ा नजफ़ पहुंचेगा। 8 जुलाई को सुबह 6 बजे नजफ़ और शाम 4 बजे कर्बला में अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। इसके बाद पार्थिव शरीर को वापस ईरान ले जाया जाएगा। याद रहे कि मक्का और मदीना के बाद नजफ़ और कर्बला को शिया इस्लाम के सबसे ऐतिहासिक व पवित्र शहरों के रूप में मान्यता हासिल है। इसतरह अंतिम दिन यानी 9 जुलाई को अली ख़ामेनेई के जनाज़े को मशहद में शिया समुदाय के आठवें इमाम, इमाम रज़ा के मक़बरे में सुपुर्द-ए-ख़ाक़ किया जाएगा। अंतिम विदाई के बाद भी चालीस दिनों तक विभिन्न प्रांतों में धार्मिक सभाएं, प्रार्थनाएं आदि आयोजित की जाएंगी और अगले साल तक भी कार्यक्रम और सम्मेलन आयोजित किए जाते रहेंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि अंतिम संस्कार के इस आयोजन में ईरान-इराक़ सहित पूरे विश्व के क़रीब ढाई से तीन करोड़ तक लोग शरीक होंगे। अंतिम विदाई के इन समारोहों को ईरान केवल एक धार्मिक रस्म के रूप में ही नहीं बल्कि पिछले दिनों हुये युद्ध के बाद उभरी ईरान की राजनीतिक और कूटनीतिक ताक़त के बड़े प्रदर्शन के तौर पर भी देख रहा है।                       

इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान केवल पद, सत्ता या प्रसिद्धि से नहीं होती, बल्कि उनके चरित्र, जीवन-शैली,सादगी,समर्पण और सेवा-भाव से बनती है। आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई का जीवन भी उन्हीं व्यक्तित्वों में प्रमुख था जिसे सादगी, अनुशासन, आत्म-नियंत्रण और समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हालांकि उन्होंने ईरान में सर्वोच्च नेता के रूप में 47 वर्ष बिताए, जिसमें लगभग 40 वर्ष ईरान के रक्षा मंत्री , प्रेसिडेंट और सुप्रीम लीडर के तौर पर शामिल हैं। इसके बावजूद उनका सादा जीवन इस बात का संदेश देता है कि महानता केवल भव्यता के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने में होती है। ख़ामेनेई ने बचपन से ही शिक्षा, क़ुरआन और दीनी सेवा को अपने जीवन के केंद्र में रखा। उन्होंने पढ़ाई, तालीम, तफ़सीर, और राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों को एक साथ आगे बढ़ाया, और बार-बार गिरफ़्तारी व  निर्वासन के बावजूद अपना काम ताउम्र जारी रखा। वे अपने निजी जीवन में भी साधारण रहन-सहन पसंद करते थे। उनका पूरा परिवार भी बेहद साधारण जीवन जीता था। उन्होंने कभी सरकारी वेतन नहीं लिया। ख़ामनेई निजी लाभ, दिखावे और सत्ता की सुविधाओं से हमेशा दूर रहते थे। इसीलिये उनके जीवन को एक आदर्श,ईमानदारी व ज़िम्मेदारी की मिसाल के रूप में पेश किया जाता है। उनका पारिवारिक वातावरण धार्मिक, संयमी और सरल था। बचपन से ही उन्होंने कठिनाइयों, सीमित साधनों और संघर्षों के बीच शिक्षा प्राप्त की। ऐसे वातावरण में पले-बढ़े व्यक्ति के भीतर ही जीवन की सच्ची क़ीमत समझने की क्षमता विकसित होती है। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व में दिखावे से अधिक गंभीरता, और आराम से अधिक कर्तव्य दिखाई देता है।            

जब कोई व्यक्ति सत्ता की शक्ति के शिखर पर होते हुए भी सामान्य जीवन मूल्यों से जुड़ा रहता है, तो वह केवल प्रशंसा का पात्र ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिये प्रेरणास्रोत भी बन जाता है। उन्होंने अपने निजी जीवन में भी हमेशा विलासिता से दूरी बनाए रखी और सादगी को ही अपनी आदत, अपनी शैली और अपने स्वभाव का हिस्सा बनाया। यह सादगी केवल बाहरी नहीं थी, बल्कि उनके विचारों और प्राथमिकताओं में भी नज़र आती थी। वे दिखावे के बजाय दायित्व को महत्व देते थे  और निजी सुविधा की जगह सार्वजनिक ज़िम्मेदारी को। मानवता का मूल भी यही है कि शक्ति व सुविधा का उपयोग अपने अहंकार के लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए होना चाहिये। इसी लिये शहादत से ठीक पहले कहे गये उनके वह शब्द इतिहास में दर्ज हो चुके हैं कि जब उनसे उनके सलाहकारों द्वारा अमेरिकी-इस्राईली हमलों से बचने के लिये सुरक्षित स्थान पर जाने के लिये कहा गया तो उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए किसी बंकर या सुरक्षित स्थान पर जाने से यह कहकर मना किया कि ‘पहले राजधानी तेहरान के सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित जगह की व्यवस्था हो तभी मैं भी अपना घर छोड़ूंगा’। और इसी के कुछ क्षणों बाद ही वे भीषण हवाई हमले में शहीद हो गये।             

निःसंदेह उनके इसी समर्पण,सादगी व शिक्षा को सर्वाधिक महत्व देने के साथ करबला से प्रेरणा लेने का ही परिणाम था कि उन्होंने न केवल अपने जीते जी अमेरिका के स्वयं को विश्व का सर्वशक्तिमान समझने का घमंड चकनाचूर कर दिया बल्कि अपनी शहादत के बाद भी एक ऐसा ईरान खड़ा कर गये जो क्या अमेरिका तो क्या इस्राईल किसी के भी वर्चस्व या शक्ति को स्वीकार करने से इंकार कर रहा है। उनकी शहादत पूरी दुनिया के लोगों ख़ासकर सत्ताधीशों के लिये उदाहरण पेश करती है। शहीद सैयद अली ख़ामनेई को अलविदा कहते हुये कुंवर महेंद्र सिंह बेदी ‘सहर’ के शब्दों में यही कहूंगा कि ‘जी के मरना तो सब को आता है। मर के जीना सिखा दिया तूने।। संपर्क:9896219228                                                                        

 

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