HomeHealth & Fitnessलम्बी अवधि के इलाज के लिए होम्योपैथी कारगर: डॉ रवींद्र मोहन कौशल 

लम्बी अवधि के इलाज के लिए होम्योपैथी कारगर: डॉ रवींद्र मोहन कौशल 

लखनऊ। दुनिया भर में इस वक्त पर्यावरण को लेकर सभी बड़ी चुनौती प्रदूषण है। खासकर वायु प्रदूषण लोगों को लगातार बीमार बना रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक हर साल लगभग 50 लाख लोग वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के चपेट में आकर इसका शिकार होते हैं। वहीं कोविड के बाद फेफड़ो में संक्रमण के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। आईआईएम लखनऊ में मेडिकल अफसर की सेवा दे चुके डॉ रविंद्र मोहन कौशल के मुताबिक लम्बी अवधि के इलाज के लिए होम्योपैथी कारगर साबित हुई है। डॉक्टर के मुताबिक लम्बे समय तक एलोपैथी के प्रयोग से लीवर और किडनी डैमेज होने का डर बना रहता है। 

होम्योपैथी के वरिष्ठ डॉक्टर रविंद्र मोहन कौशल ने बताया कि कोरोना के समय में भी होम्योपैथी ने कई जाने बचाई। फेफड़ो के संक्रमण को रोकने के लिए एस्पीडो स्पर्मा और आर्सेनिक जैसी दवाइयां कारगर साबित हुई हैं। डॉक्टर बताते हैं कि कोरोना के बाद से ऐसे मामले में तेजी आई है। फेफड़ा संक्रमित लोगों का एक्स रे देखने पर उसमे सफेद स्पॉट साफ़ दिखाई देता है। यह कभी भी ठीक न होने वाली बीमारी में आता है। अतः ऐसी बीमारी में जितना अधिक सावधानी बरती जाए,अति आवश्यक है। चूंकि यह यह बीमारी सही नहीं हो सकती है इसके लिए होम्योपैथिक सटीक दवा है,जो इस संक्रमण को बढ़ने से रोकती है। 

गौरतलब है कि भारत में फेफड़ों का कैंसर, सीओपीडी, अस्थमा और टीबी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। 2022 में भारत में 81,748 फेफड़ों के कैंसर के नए मामले दर्ज हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, साल 2021 में पूरी दुनिया में 35 लाख लोगों की मौत क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के कारण हुई। 90 फीसदी से अधिक मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। सीओपीडी दुनिया भर में बीमारी की समस्या के लिहाज से आठवां सबसे बड़ा कारण है। 
 
वहीं विकसित देशों में 70 फीसदी और विकासशील देशों में 30 से 40 फीसदी मामले धूम्रपान से होते हैं। घरेलू वायु प्रदूषण – लकड़ी, कोयला या गोबर से खाना पकाने से निकलने वाला धुआं। धूल, धुएं या रासायनिक पदार्थों के संपर्क में आना – जैसे फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर। बचपन में बार-बार होने वाला फेफड़ों का संक्रमण या कमजोर शारीरिक विकास। जन्मजात रोग जैसे अल्फा-1 ऐन्टीट्रिप्सिन की कमी।

जब भी आप सांस लेते हैं, तो आप सिर्फ ऑक्सीजन ही नहीं, बल्कि दूसरी चीजें भी अंदर लेते हैं. हवा में धूल, धुआं, केमिकल और ऐसी ही दूसरी बहुत छोटी और न दिखने वाली चीजें होती हैं. ये इतनी छोटी होती हैं कि आमतौर पर दिखाई नहीं देतीं, लेकिन सांस लेने पर ये आपके फेफड़ों में गहराई तक जा सकती हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक स्टडी के अनुसार, वायु प्रदूषण से निकलने वाले छोटे-छोटे प्रदूषक तत्वों के ज्यादा संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो सकती है।

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन द्वारा की गई एक रिसर्च के अनुसार वायु प्रदूषण का फेफड़ों पर बुरा असर डाल रहा है। प्रदूषित हवा की वजह से सांस लेना मुश्किल हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, अस्थमा या फेफड़ों से जुड़ी दूसरी बीमारियां हैं। प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों से नाक के रास्ते, फेफड़ों और गले में जलन और सूखापन हो सकता है। आपको जलन महसूस हो सकती है या बार-बार खांसी आ सकती है। वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो सकती है और COPD जैसी बीमारियां हो सकती हैं। वायु प्रदूषण से प्रभावित फेफड़ों में निमोनिया या ब्रोंकाइटिस जैसे संक्रमण होने का खतरा ज्यादा होता है।

जिन लोगों को दिल की बीमारी, अस्थमा या एलर्जी है, वे अगर प्रदूषित हवा में रहते हैं या किसी ऐसी जगह पर रहते हैं जहां एयर क्वालिटी अच्छी नहीं है तो उनके लक्षण बढ़ सकते हैं।

बवासीर और गठिया के लिए संजीवनी है होम्योपैथी 

वरिष्ठ होम्योपैथिक डॉक्टर रविंद्र मोहन कौशल कहते हैं कि आज के समय में बदलते खान-पान और मिलावटी जमाने में बवासीर की समस्या आम हो गई है। ऐसे में एलोपैथी के डॉक्टर लोगों को सीधे ऑपरेशन करने की सलाह दे देते हैं। लेकिन मात्र ऑपरेशन करने से यह समस्या खत्म नहीं हो जाती है। यह बिलकुल एक पेड़ को तने से काटने जैसा है। जबकि जड़ बनी रहती है। ऐसे में दोबारा यह बीमारी  होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में होम्योपैथी से इसका इलाज सम्भव है। वहीं गठिया रोग के लिए भी एलोपैथिक के डॉक्टर लम्बे समय तक दवा चलाने के बाद घुटना प्रत्यारोपण की सलाह देते हैं। लेकिन होम्योपैथी से इसका इलाज सम्भव है।  

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