रिपोर्ट:गजेंद्र कुमार गुप्त।
महराजगंज: जिले के दो होनहार स्केटर, रितेश और शिवशंकर, ने अपनी हिम्मत और ज़ज्बे के दम पर स्केटिंग करते हुए अयोध्या, खाटू श्याम, केदारनाथ, चार धाम और हरिद्वार जैसी कठिन और लंबी धार्मिक यात्राएं पूरी कर पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया। 25 जुलाई को महराजगंज से अपनी ऐतिहासिक यात्रा पर निकले दोनों युवाओं ने गुरुवार को पवित्र गंगाजल के साथ जनपद में वापसी की। सक्सेना तिराहे पर स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया। युवाओं की यह अनूठी मेहनत, अदम्य साहस और दृढ़ लगन निस्संदेह हर स्तर पर सराहना की हकदार है। हालांकि, इस शानदार उपलब्धि के बीच स्थानीय राजनीति का वही पुराना और बहुचर्चित चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया—चाहे अवसर किसी संघर्षशील युवा की सफलता का हो या किसी गंभीर जनसमस्या का, नेताओं की मौजूदगी और स्व-प्रचार मूल मुद्दे से कहीं अधिक हावी दिखाई देने लगता है। दोनों स्केटरों ने सैकड़ों किलोमीटर का कठिन सफर स्केटिंग के जरिए तय कर अपनी असीम प्रतिभा और क्षमता को साबित कर दिखाया। लेकिन स्वागत समारोह में अचानक उमड़े नेताओं के हुजूम को देखकर आम जनता के बीच यह सवाल तेजी से गूंजता रहा कि क्या इन संघर्षरत युवाओं को यात्रा की शुरुआत से पहले कोई ठोस सहयोग, प्रशासनिक मार्गदर्शन या आर्थिक प्रोत्साहन मिला था? या फिर सिर्फ सफलता की मंजिल छूकर लौटने के बाद फूल-मालाएं पहनाने और अंगवस्त्र ओढ़ाकर फोटो खिंचवाने तक ही नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी सीमित है?
विडंबना यह है कि सीमावर्ती महराजगंज जिले में प्रतिभावान युवाओं की कोई कमी नहीं है। खेलकूद, शिक्षा और कला जैसे विविध क्षेत्रों में यहां की प्रतिभाएं अपने बलबूते और सीमित संसाधनों में आगे बढ़ने का लगातार प्रयास कर रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह उठता है कि क्या स्थानीय नेतृत्व और जनप्रतिनिधि इन उभरती प्रतिभाओं को केवल मंच की शोभा बढ़ाने तक सीमित रखेंगे, या फिर उनके संघर्ष के दौर में सच्चा मददगार बनकर साथ खड़े होंगे।स्वागत कार्यक्रम के दौरान नेताओं ने भले ही मंच से युवाओं के साहस और समर्पण को क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक करार दिया, लेकिन धरातल की हकीकत बिल्कुल अलग है। आज के हुनरमंद युवाओं को केवल तात्कालिक वाहवाही, माला और अंगवस्त्र की औपचारिकताएं नहीं चाहिए; बल्कि उन्हें उत्कृष्ट प्रशिक्षण, आधुनिक संसाधन, मुकम्मल खेल सुविधाएं और आगे बढ़ने के वास्तविक अवसर दरकार हैं।यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और संगठन युवाओं की इस गौरवशाली उपलब्धि को राजनीतिक चमक-दमक का जरिया बनाने के बजाय वास्तव में उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए धरातल पर काम करें, तो ऐसा स्वागत सही अर्थों में सार्थक कहलाएगा। वरना यह तीखा सवाल हमेशा हवा में तैरता रहेगा।स्केटिंग युवाओं ने की, कठिन रास्ता युवाओं ने नापा और इतिहास भी युवाओं ने रचा, तो फिर सफलता के पोस्टर और तस्वीरों में सबसे आगे नेता जी क्यों। यह सवाल सिर्फ रितेश और शिवशंकर की इस यात्रा का नहीं है, बल्कि महराजगंज के उन तमाम गुमनाम और संघर्षशील युवाओं का है, जो बिना किसी सरकारी व सियासी संरक्षण के अपनी प्रतिभा के दम पर मुकाम हासिल करने का सपना देखते हैं।












