Homeदेश (National)महाराष्ट्र, उत्तराखंड, MP..., हर राज्य के UCC से आदिवासी बाहर क्यों?

महाराष्ट्र, उत्तराखंड, MP…, हर राज्य के UCC से आदिवासी बाहर क्यों?

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव की अगुवाई वाली कैबिनेट ने समान नागरिक संहिता (UCC) से जुड़ा एक विधेयक मसौदा पास किया है। राज्य सरकार, हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई और अन्य धार्मों के लिए एक समान नागरिक संहिता की बात कर रही है। सरकार का कहना है कि चाहे राम हों या रहीम हों, कानून की नजरों में संपत्ति, विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े नियम कायदे सभी के लिए एक होंगे। अब तक, हिंदू, मुस्लिम और ईसाइयों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून हैं। जैन, बौद्ध और सिख धर्म के लोग, हिंदू कानूनों के तहत ही शासित होते हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने समान नागरिक संहिता का जिक्र करते हुए यह भरोसा दिया है कि आदिवासियों की धार्मिक पद्धतियों से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। उनकी परंपराओं और प्रथाओं की रक्षा की जाएगी। मध्य प्रदेश समान नागिरक संहिता विधेयक से आदिवासियों को कोई धार्मिक अधिकार नहीं छिनेगा। उनकी पूजा पद्धति, विवाह और विरासत संबंधी प्रथाओं पर कोई असर नहीं होगा।

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किन राज्यों में UCC की हो रही है आवाज?

मध्य प्रदेश से पहले उत्तराखंड, गुजरात और असम ने भी समान नागरिक संहिता की कवायद की है। तीनों राज्यों ने शादी, उत्तराधिकार से लेकर लिव-इन तक नियम-कानून बनाए हैं। कुछ राज्य और लागू करने की कतार में हैं। मई में दोबारा सरकार में आने के बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने विधेयक पास किया था, जिसमें तलाक, उत्तराधिकार और लिव इन से जुड़े नियम कानून तैयार किए गए थे।

4 राज्यों का UCC मॉड्यूल क्या है?

असम के समान नागरिक संहिता में राज्य में शादी, तलाक, संपत्ति बंटवारा और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों पर नियम तय किए गए हैं। उत्तराखंड और गुजरात में यह कानून लागू हो चुका है। राज्यों का कहना है कि समान नागरिक संहिता पर कानून बनाना संवैधानिक है, राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी राज्यों के लिए एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए।

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क्या नियम तय किए गए हैं?

सभी राज्यों के UCC नियमों से एक समान सिविल कानूनों की बात की गई है। अब तीनों राज्यों के कानून में काफी समानताएं हैं। शादी के लिए पुरुष की न्यूनतम उम्र 21 साल और महिला की 18 साल रखी गई है। बहुविवाहों पर पूरी तरह प्रतिबंधित है। हर शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। आदिवासी समुदायों के हर राजयो इस कानून से बाहर रखा गया है।

लिव-इन रिलेशनशिप पर भी अब सख्त नियम आए हैं। साथ रहने वाले जोड़ों को रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा होगी। बच्चों को संपत्ति का अधिकार मिलेगा, भले ही माता-पिता की शादी न हुई हो।

उत्तराखंड ने सबसे पहले इस पर कानून बनाया, असम भी लगभग वैसा ही है, जबकि गुजरात में नियम तोड़ने पर सजा ज्यादा सख्त है। संपत्ति के बंटवारे में भी बड़ा बदलाव है। पहले हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि के अपने-अलग कानून थे। अब सबके लिए एक ही नियम होगा। हर राज्य में आदिवासियों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।

आदिवासी इस दायरे से बाहर क्यों हैं?

सभी राज्यों में आदिवासियों को इस दायरे से बाहर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सौरभ गुप्ता ने कहा, ‘समान नागरिक संहिता लागू करने वाले राज्यों में अनुसूचित जनजातियों को छूट देने की वजह संवैधानिक सुरक्षा और उनकी सांस्कृतिक पहचान को बचाना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(25) और 342 के तहत जनजातीय समुदायों को विशेष दर्जा मिला हुआ है। इन प्रावधानों के कारण उन्हें अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज और कानून बनाए रखने का अधिकार है।’

एडवोकेट सौरभ गुप्ता ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 371 के उपबंधों में और छठी अनुसूची कुछ जनजातीय क्षेत्रों को उनके प्रथागत कानून, विवाह, उत्तराधिकार और भूमि व्यवस्था पर पूरा स्वायत्तता देती हैं। इन संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करके आदिवासियों को UCC के दायरे में रखना मुश्किल और जटिल है।’

एडवोकेट सौरभ गुप्ता, ‘उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना है जहां समान नागरिक संहिता लागू हुई है। यहां भी कई जनजातियों को इस दायरे से बाहर से बाहर किया गया है। सरकारें और ये जनजातियां खुद सोचती हैं कि इन्हें एक समान कानून के दायरे में लाने से इनकी पहचान और संस्कृति खतरे में पड़ सकती है। पंचवीं और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में पहले से ही विशेष प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है। UCC लागू करने पर दोहरी व्यवस्था की समस्या आ सकती है।’

आलचोना क्या है?

एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, ‘जनजातीय संगठनों का साफ मानना है कि उन्हें समान नागरिक संहिता के दायरे में नहीं रहना है। कुछ जनजातियों में बहु विवाह की प्रथा है, कुछ जगह एक महिला दो लोगों से शादी कर सकती है, अब इन सबको एक ढांचे में लाना मुश्किल है। UCC का मकसद तो इससे अधूरा रहता है। यही कानूनी छूट, असंगतियां पैदा करता है। समान नागरिक संहिता और जनजातीय अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए आज भी टेढ़ी खीर है।’

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