बालासराय में मोहर्रम का जुलूस निकाला गया। इस दौरान शिया-सुन्नी समुदाय के लोगों ने भाईचारे का संदेश दिया। जुलूस में सबसे बड़ी और सबसे छोटी ताजिया आकर्षण का केंद्र रहीं। जुलूस सुबह सरयू घाट क्षेत्र से शुरू हुआ। हजारों की संख्या में अजादार काले लिबास में सड़कों पर उतरे। ‘या हुसैन, या हुसैन’ के नारों के साथ जुलूस बालासराय के मुख्य मार्गों से गुजरा और शांति व भाईचारे का संदेश दिया। इस वर्ष बालासराय की सबसे बड़ी ताजिया लगभग 15 फीट ऊंची थी। इसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचे। बांस और कागज की महीन कारीगरी से बनी इस ताजिया को रंग-बिरंगे कांच और फूलों से सजाया गया था। इसके साथ ही, एक 2 फीट की सबसे छोटी ताजिया भी जुलूस का हिस्सा थी। इसे एक मां ने अपने कंधों पर उठाया, जो आस्था और प्रेम का प्रतीक बनी। बड़ी और छोटी ताजिया ने यह संदेश दिया कि आस्था का कोई निश्चित आकार नहीं होता। जुलूस मार्ग पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने जगह-जगह शरबत, पानी और लंगर की व्यवस्था की। स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। कई गणमान्य व्यक्ति भी जुलूस में शामिल हुए और शांति व सद्भाव की कामना की। शाम को ताजियाओं को कर्बला के मैदान में सुपुर्दे-खाक किया गया। नौहाख्वानों ने कर्बला के शहीदों की शहादत को याद किया।
बालासराय में मोहर्रम का जुलूस निकला:सबसे बड़ी और छोटी ताजिया बनीं आकर्षण का केंद्र
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