नासिरगंज कस्बे में स्थित हुसैनिया इमामबाड़ा आज भी अपनी 500 साल पुरानी ऐतिहासिक ज़री (ताजिया) के लिए पूरे क्षेत्र में खास पहचान रखता है। यह ज़री न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है, बल्कि हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रतीक भी मानी जाती है। पांच सदियों पुरानी यह धरोहर आज भी अपनी भव्यता और खूबसूरती से लोगों को आकर्षित कर रही है। स्थानीय इतिहास और परंपराओं के अनुसार, इस ऐतिहासिक ज़री को नवाब नासिर हुसैन खान ने ईरान से मंगवाया था। तभी से यह ज़री नासिरगंज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बन गई। लंबे समय के बावजूद इसकी बनावट, सुनहरी चमक और बारीक नक्काशी आज भी सुरक्षित है। गुंबदनुमा कलाकृति और आकर्षक डिजाइन इसे बेहद खास बनाते हैं। इस विरासत की देखरेख में कई लोगों का अहम योगदान रहा है। नवाब नासिर हुसैन खान के बाद लंबे समय तक मोहम्मद हुसैन खां ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। उनके बाद शाकिर हुसैन उर्फ बब्बू ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में ‘अंजुमन हुसैनिया’ द्वारा इमामबाड़े और इस ऐतिहासिक ज़री का संरक्षण किया जा रहा है। यह ज़री कर्बला के शहीद हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) की यादों से जुड़ी हुई है। यह लोगों को उनके सत्य, इंसाफ और बलिदान के संदेश की याद दिलाती है। मुहर्रम के दौरान यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मातम और मजलिसों के जरिए कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
नासिरगंज की शान बनी 500 साल पुरानी ज़री:ईरान से आई थी ऐतिहासिक धरोहर, मुहर्रम में उमड़ती है भीड़
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