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स्वामी चिदानन्द के 75वां जन्मोत्सव पर्यावरण महोत्सव के रूप में मना, संतों ने दीं शुभकामनाएँ 

  • यमुना के पावन तटों पर लाखों-लाखों पौधों के रोपण का प्लान

ऋषिकेश। इतिहास के कुछ क्षण युगों की दिशा निर्धारित करते हैं। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष, आध्यात्मिक जगत के प्रेरणास्रोत, सेवा, साधना और संस्कारों के पर्याय परम स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज के 75वें वर्ष में प्रवेश का पावन अवसर ऐसा ही एक दिव्य, विलक्षण और ऐतिहासिक क्षण है। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के प्रांगण में आज योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज, दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा , गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द महाराज, महंत रविन्द्र पुरी महाराज, साध्वी भगवती सरस्वती जी, संत मुरलीधर महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतानन्द महाराज, स्वामी वेदविद्यानन्द महाराज हैदराबाद, महामंडलेश्वर स्वामी ईश्वरदास महाराज, स्वामी दयाराम दास महाराज, मूर्तिमन्त प्रभु जी, स्वामी जयंत सरस्वती जी महाराज, स्वामी शुक्राईनाथ तथा अनेक संतों एवं विभूतियों का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।

परमार्थ निकेतन द्वारा स्वामी जी के अवतरण दिवस को “पर्यावरण महोत्सव” के रूप में मनाते हुए 75 हजार पौधों के रोपण का महासंकल्प संत श्री मुरलीधर जी महाराज ने लिया। इस पावन अभियान का शुभारम्भ परमार्थ निकेतन परिसर में दिव्य रुद्राक्ष के पौधे के रोपण के साथ हुआ, जो वास्तव में आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन, हरियाली और आशा का रोपण है। जैसे ही 75 हजार पौधों के रोपण की घोषणा व्यासपीठ से अनेक श्रद्धालुओं व भक्तों ने अपने संकल्पों को दोहराया कि हम भी अपने जन्मदिवस, विवाहदिवस, पर्व व त्यौहारों के अवसर पर एक से लेकर 11 हजार, 21 हजार पौधों का रोपण करेंगे, ऐसे अनेक संकल्प की गूंजें और हरित जन्मदिवस मनाने की प्रेरणा जागृत हुई। 

स्वामी जी का जीवन स्वयं एक जीवंत महाकाव्य है। कैलाश मानसरोवर की दुर्गम एवं गगनचुम्बी हिमालयी चोटियों पर आश्रमों एवं फस्र्ट एड सेंटर्सं की स्थापना, माँ गंगा सहित अनेक नदियों की निर्मलता और अविरलता के लिए वैश्विक जनआंदोलन, ‘‘देवालय से शौचालय’’ तक स्वच्छता का क्रांतिकारी संदेश, विश्व पटल पर सनातन संस्कृति का गौरवपूर्ण उद्घोष, दिव्यांगता-मुक्त भारत का संकल्प, चिकित्सा एवं मानव सेवा के विराट अभियान, गौ संरक्षण, भारतीय विरासत के संवर्धन और राष्ट्र प्रथम की भावना, इन सभी आयामों में स्वामी का व्यक्तित्व सदैव एक युगदृष्टा के रूप में रहा है।

वे संकल्प, सेवा और संवेदना की ऐसी ज्योति हैं, जो अनगिनत जीवनों को दिशा प्रदान कर रही है। उनका सहज, सरल, निर्मल और माँ गंगा की तरह निष्छल व्यक्तित्व करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

परमार्थ निकेतन में संत मुरलीधर जी महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही मासिक मानस कथा की दिव्य व्यासपीठ से देश-विदेश से पधारे संतों एवं विभूतियों ने उनके अवतरण दिवस पर शुभाशीष एवं मंगलकामनाएँ अर्पित कीं।

अवतरण दिवस के इस महापर्व पर परमार्थ निकेतन द्वारा हजारों श्रद्धालुओं, संतों, निराश्रितों एवं जरूरतमंदों के लिए महाप्रसाद वितरण का शुभारम्भ किया गया। सेवा, समर्पण और सद्भाव की यह धारा दिनभर अविरल प्रवाहित होती रही।

आज का यह आयोजन एक ऐसे संत के जीवन और संकल्पों का अभिनंदन है, जिन्होंने अपने जीवन को स्वयं तक सीमित न रखकर मानवता, प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। 75 हजार पौधों का यह महासंकल्प आने वाले समय में एक हरित क्रांति का आधार बनेगा और यह संदेश देगा कि जब एक संत संकल्प लेता है, तो वह केवल वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी बदल देता है।

माँ गंगा और धरती माँ को हरित अभिनंदन के साथ यह अवतरण दिवस सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण के एक नए अध्याय का शुभारम्भ है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सभी संतों व दिव्य विभूतियों का परमार्थ निकेतन में अभिनन्दन करते हुए कहा कि यह जीवन गुरुओं और माता-पिता के दिव्य आशीर्वाद का प्रतिफल है।

“पड़ा था सूना सितार दिल का, हुई अचानक यह जाग तुमसे।
जो जिन्दगी रोग बन गई थी, वह बन गई आज राग तुमसे।
यह मेरे जीवन की रागिनी क्या, मिला है मुझको यह राग तुमसे,
मिला है मुझको यह प्यार तुमसे।”

“मैं तो कब से तेरी शरण हूँ, मेरी ओर तो भी तो ध्यान दो।” प्रभु के श्रीचरणों में प्रार्थना करते हुये कहा कि बस ये जीवन महापुरूषों की कृपा से प्रभु की सेवा में लगा रहे, बस यही प्रभु से प्रार्थना है। संतों का जो सान्निध्य आज हमें प्राप्त हुआ, यही जीवन का प्रसाद है। जीवन प्रेरणा बने, लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे, यही जीवन का सार है।

इस अवसर पर  मुरारी बापू, भाईश्री, श्रीश्री रविशंकर जी महाराज सहित अनेक संतों, राजनेताओं एवं विभिन्न क्षेत्रों की विभूतियों ने दूरभाष एवं संदेशों के माध्यम से स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ अर्पित कीं।

इस पावन अवसर पर संतों के उद्बोधनयोगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि स्वामी पूरी मानवता के मुकुटमणि हैं। संतों के जीवन का अनुकरण ही हमारा जीवन है। भारत के सभी सर्वोच्च कोटि के महापुरुष, वर्तमान व पूर्व माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मंत्री, सांसद अथवा विभिन्न राष्ट्रों के राजदूत, सभी का अपार स्नेह स्वामी के प्रति है। ऐसा कोई दिन नहीं होता, जिस दिन कोई वैश्विक विभूति परमार्थ निकेतन न आती हो। ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व है स्वामी महाराज का।

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि स्वामी जी ने पर्यावरण संरक्षण के प्रहरी के रूप में पूरे विश्व को जागृत किया और इस ज्ञान से पूरी मानवता को आलोकित कर रहे हैं। भारत के अमृतकाल में आपका 75वें वर्ष में प्रवेश वास्तव में अमृतकाल है। आपने पर्यावरण चेतना की जो अलख जगाई, वह वंदनीय है। उन्होंने कहा कि दस बेटों के बराबर एक बेटी है और सौ बेटों के बराबर एक पेड़ है, और वही पेड़ स्वामी जी भेंटस्वरूप पूरी दुनिया को प्रदान करते हैं।

दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी ने कहा कि जो अर्पित व समर्पित हो जाए, वही तो संत है। संत व्यक्ति या वस्त्र नहीं, वह तो एक स्वभाव है। संत के चरणों में समर्पित मन निर्मल हो जाता है। स्वामी जी ने धरती की पीड़ा को हरने का कार्य किया। धरती ने स्वामी जी को पुत्र के रूप में पुकारा कि आइए और मेरी चुनरी को हरा-भरा बना दीजिए। स्वामी जी ने अपना पूरा जीवन इसी हेतु समर्पित कर दिया।

स्वामी ज्ञानानन्द महाराज ने कहा कि मनुष्य जन्म मिलना और उसके पश्चात उसकी सार्थकता होना अत्यंत दुर्लभ है। हजारों में कोई विरला ही होता है जिसे इसका अनुभव होता है। ऐसे ही हमारे स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज हैं। उन्होंने अपने अहं को तप से गलाकर मानवता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रचेतना और राष्ट्रप्रेम को समर्पित जीवन जिया है। गंगा जी की आरती के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रचेतना को जागृत किया तथा परमार्थ आश्रम को विराट स्वरूप प्रदान किया।

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