- खुफिया चेतावनी के बावजूद नहीं हुई ठोस कार्रवाई
- सुरक्षा तंत्र की खामियों पर सरकार की चुप्पी बरकरार
नई दिल्ली। पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर देश एक बार फिर उस दर्दनाक घटना को याद कर रहा है, लेकिन उससे जुड़े सबसे अहम सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के बैसरन मैदान में हुए इस हमले में 25 पर्यटकों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। घटना ने न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, बल्कि केंद्र सरकार के उस दावे को भी चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में स्थायी शांति स्थापित हो चुकी है।
हमले के एक साल बाद भी केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि आखिर वह कौन सी ‘सुरक्षा चूक’ थी, जिसके कारण यह हमला संभव हो सका। घटना के बाद सर्वदलीय बैठक में गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने चूक की बात तो स्वीकार की थी, लेकिन उस चूक की प्रकृति, जिम्मेदार अधिकारियों या सुधारात्मक कदमों पर कोई ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। यही चुप्पी अब सरकार की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनती जा रही है।
जानकारों के अनुसार, हमले से पहले खुफिया एजेंसियों ने पर्यटकों को निशाना बनाए जाने की चेतावनी दी थी। इसके बावजूद न तो संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाई गई और न ही बैसरन जैसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर पर्याप्त निगरानी रखी गई। यह तथ्य और भी गंभीर हो जाता है कि घटना स्थल के आसपास सेना और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी के बावजूद मैदान पूरी तरह असुरक्षित था। रिपोर्ट्स यह भी संकेत देती हैं कि हमले से पहले सीआरपीएफ की एक कंपनी को वहां से हटा लिया गया था, जबकि पहुंच मार्ग पर भी कोई सुरक्षा तैनाती नहीं थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल चूक थी या सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक विफलता। हमले की जांच में भी कई विसंगतियां सामने आईं।
शुरुआती दौर में जारी किए गए हमलावरों के स्केच बाद में गलत साबित हुए, जिससे जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा। एक साल बीतने के बावजूद हमले के वास्तविक मास्टरमाइंड और नेटवर्क पर स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आ सकी है। राजनीतिक स्तर पर भी इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि सरकार सुरक्षा विफलताओं को स्वीकार करने और जिम्मेदारी तय करने से बच रही है। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि अगर समय रहते खुफिया सूचनाओं पर समन्वित कार्रवाई होती, तो इस त्रासदी को टाला जा सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास की कमी भी ऐसी घटनाओं का एक बड़ा कारण बनती जा रही है। केवल कठोर सुरक्षा नीति अपनाने से अल्पकालिक नियंत्रण तो संभव है, लेकिन दीर्घकालिक शांति के लिए जमीनी स्तर पर सहयोग और संवाद जरूरी होता है।
पहलगाम हमले की बरसी ऐसे समय आई है जब देश जवाब चाहता है-क्या सुरक्षा ढांचे में कोई सुधार हुआ? क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? और सबसे अहम, क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक यह त्रासदी केवल एक बीती घटना नहीं, बल्कि एक अधूरी जवाबदेही का प्रतीक बनी रहेगी।












