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बस्ती जिले के कप्तानगंज थाने को स्थानीय लोग ‘मुर्गों का थाना’ भी कहते हैं। यहां सैकड़ों मुर्गे थाना परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, जिनकी देखभाल और सुरक्षा का पूरा इंतजाम स्वयं थाने की पुलिस करती है। दरअसल, थाना परिसर में लगभग 300 वर्ष पुरानी खादिम अब्दुल मोहम्मद शहीद बाबा की मजार स्थित है। पहले यह मजार पुराने थाने के ठीक सामने थी, जो अब थाने के पीछे है। मजार से मात्र 10 कदम की दूरी पर एक मंदिर भी है, जो सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। जिन श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे मजार पर आकर जिंदा मुर्गा चढ़ाते हैं और वहीं छोड़कर चले जाते हैं। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। मजार पर आने वाले श्रद्धालु इन मुर्गों के लिए दाना भी साथ लाते हैं। थाने के पीछे मुर्गों के रहने के लिए एक अलग कमरा बनाया गया है। सुबह इन्हें खोल दिया जाता है और ये दिनभर थाना परिसर में विचरण करते हैं। थाने के मेस में बनने वाले खाने में से भी इन मुर्गों को हिस्सा मिलता है। इन मुर्गों की एक विशेषता यह है कि एक आवाज पर सभी मुर्गे दौड़कर आ जाते हैं और चारों ओर से घेर लेते हैं। इनसे जुड़ी एक पुरानी मान्यता भी है। वर्षों पहले एक थानेदार ने इन मुर्गों को मेस में पकवा दिया था और बाकी बेच दिए थे। इसके बाद उन पर कई मुसीबतें आईं। बाद में उन्होंने बाबा के स्थान पर आकर प्रायश्चित किया, जिसके बाद उन्हें राहत मिली। तब से किसी भी पुलिसकर्मी ने इन मुर्गों को नुकसान नहीं पहुंचाया है।
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कप्तानगंज थाने में पुलिस करती है मुर्गों की सुरक्षा:300 साल पुरानी मजार पर श्रद्धालु छोड़ जाते हैं मुर्गे
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