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महुआ डाबर में ‘शौर्य दिवस’ पर शहीदों को सलामी:1857 के क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि, विरासत बचाने का संकल्प

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बस्ती में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय “महुआ डाबर महोत्सव” का बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय ढंग से समापन हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव के अंतिम दिन को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया गया, जहां क्रांतिवीरों को राजकीय सम्मान के साथ सशस्त्र सलामी दी गई। इतिहास के अनुसार, 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीरों ने छह ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का सूत्रपात किया था। इसके प्रतिशोध में 3 जुलाई 1857 को अंग्रेजों ने पूरे गांव को जलाकर हजारों लोगों का नरसंहार किया और महुआ डाबर को ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर दिया था। ‘शौर्य दिवस’ पर आयोजित समारोह में पुलिस गारद ने अमर शहीदों को सलामी देकर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने क्रांति स्थल और संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय के निदेशक डॉ. शाह आलम राना ने आगंतुकों को उत्खनन से प्राप्त जली हुई ईंटें, सिक्के, औजार, 1857 के मुकदमों से संबंधित दस्तावेज और दुर्लभ पुस्तकों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह संग्रहालय “विस्मृति से स्मृति” तक की यात्रा का प्रतीक है और 5000 शहीदों की स्मृति का जीवंत दस्तावेज है। समापन सत्र में आयोजित विरासत संरक्षण संकल्प सभा में वक्ताओं ने आमजन से ब्रिटिशकालीन धरोहरों को संग्रहालय को सौंपकर इतिहास को संरक्षित करने का आह्वान किया। कार्यक्रम में लोक कलाकारों, स्वयंसेवकों और सहयोगियों को अंगवस्त्र और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। शहीद गाथाओं पर आधारित लोकगीतों की प्रस्तुति दी गई। दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगान के साथ महोत्सव का समापन हुआ।
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