प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर आपराधिक मामलों में आपसी समझौते के आधार पर एफआईआर रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि समझौता रक्तरंजित घटनाओं को खत्म करने का लाइसेंस नहीं बन सकता और अगर ऐसा होने दिया गया तो अपराधी कानून को बेखौफ होकर हाथ में लेने लगेंगे।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मेरठ निवासी मनोज समेत सात याचियों की याचिका खारिज करते हुए की। मामला मेरठ के खरखौदा थाना क्षेत्र का है, जहां 2025 में दो पक्षों के बीच हुए खूनी संघर्ष में बलकटी, लोहे की रॉड, फरसा और चाकू जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल हुआ था।
दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ जानलेवा हमले की एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन बाद में आपसी समझौता कर लिया। इसके आधार पर एक पक्ष ने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि चोटें इतनी गंभीर थीं कि जानलेवा साबित हो सकती थीं, ऐसे में निजी समझौते को मान्यता देना कानून के उद्देश्य के खिलाफ होगा। हालांकि, अदालत ने यह छूट दी कि यदि पुलिस ने संबंधित मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी है, तो याची ट्रायल कोर्ट में जाकर मामले को समाप्त करने की अर्जी दे सकते हैं।












