मोहर्रमुल हराम का महीना आते ही इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों की याद में अकीदतमंद ताज़ियादारी करते हैं। शिया मुसलमान इस महीने को बेहद एहतराम और अकीदत के साथ मनाते हैं। इस दौरान इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़ा-ए-मुबारक की शबीह के तौर पर ताज़िया तैयार किए जाते हैं। इस्लामी रिवायतों के अनुसार, 10 मोहर्रम 61 हिजरी को कर्बला के मैदान में पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों को यज़ीदी सेना ने शहीद कर दिया था। इमाम हुसैन (अ.स.) ने अन्याय के सामने झुकने के बजाय शहादत को चुना, जिससे इंसानियत, न्याय और सच्चाई की मिसाल कायम हुई। जो अकीदतमंद कर्बला-ए-मुअल्ला की ज़ियारत नहीं कर पाते, वे इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़े की याद में ताज़िया तैयार कर अपने घरों और इमामबाड़ों में रखते हैं। मोहर्रम के दिनों में मजलिसें आयोजित की जाती हैं, नौहाख़्वानी और मातम के ज़रिये शहीद-ए-कर्बला को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। 10 मोहर्रम, जिसे यौमे आशूरा कहा जाता है, उस दिन अकीदतमंद नम आँखों से इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके जांनिसार साथियों के महान बलिदान को याद करते हैं। ग़म-ए-हुसैन का यह संदेश आज भी अन्याय के खिलाफ़ सच्चाई पर डटे रहने का सबक देता है। इस दौरान “हर रोज़ आशूरा है और हर ज़मीन कर्बला है” का पैग़ाम विशेष रूप से महसूस किया जाता है।
मोहर्रम में ताज़ियादारी, इमाम हुसैन की याद:अकीदतमंदों ने शहीद-ए-कर्बला को पुरसा पेश किया
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