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परमार्थ निकेतन में संत शिरोमणि कबीर दास की 628वीं जयंती पर दी गई श्रद्धांजलि 

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आज वट पूर्णिमा के पावन अवसर पर मातृ शक्ति को शुभकामनायें देते हुये कहा कि वट पूर्णिमा का पावन पर्व भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का उत्सव है, जो परिवार को समाज की सबसे मजबूत इकाई मानती है। यह केवल अखंड सौभाग्य का व्रत नहीं, बल्कि जीवन में निष्ठा, समर्पण, विश्वास, धैर्य और सनातन मूल्यों को स्थापित करने का दिव्य अवसर है।

मानवता के महान उपासक, संत शिरोमणि कबीर दास जी की 628वीं जयंती पर परमार्थ निकेतन से उन्हें भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि कबीरदास जी सत्य, समरसता और सामाजिक चेतना के क्रांतिकारी स्वर थे। उन्होंने जाति-पांति, धार्मिक आडंबर, पाखंड और ऊँच-नीच की संकीर्ण सोच को निर्भीकता से चुनौती देते हुए प्रेम, करुणा, समानता और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। उनके दोहे आज भी समाज को आत्ममंथन, सदाचार और मानवता की प्रेरणा देते हैं। आइए, उनके विचारों को जीवन में अपनाकर सामाजिक सद्भाव, नैतिक मूल्यों और मानव सेवा ही माधव सेवा की भावना को सशक्त बनाने का संकल्प लें।

वट पूर्णिमा के पावन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि वट सावित्री व्रत सत्य, संकल्प, आत्मबल और धर्मनिष्ठा की विजय का पर्व है। सावित्री ने अपने अटूट विश्वास, तप और समर्पण से यह सिद्ध किया कि जब जीवन में संस्कार, श्रद्धा और धर्म का आधार होता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है।

स्वामी जी ने कहा कि पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश है कि जिस प्रकार चन्द्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं होता, बल्कि सूर्य का प्रकाश ग्रहण कर संपूर्ण जगत को शीतलता और प्रकाश प्रदान करता है, उसी प्रकार हम भी परमात्मा की दिव्य चेतना को अपने जीवन में धारण कर समाज को प्रेम, करुणा, सेवा और सदाचार का प्रकाश दे सकते हैं। यही भारतीय जीवन-दर्शन का सार है।

उन्होंने कहा कि आज का समय भौतिक प्रगति का है, लेकिन साथ ही पारिवारिक विघटन, अकेलापन, तनाव और संस्कारों के क्षरण की चुनौती भी हमारे सामने है। आधुनिकता का स्वागत अवश्य होना चाहिए, किंतु अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों की कीमत पर नहीं। यदि परिवारों में संवाद समाप्त हो जाए, यदि पीढ़ियों के बीच आत्मीयता कम हो जाए और यदि बच्चों तक संस्कारों की धारा न पहुँचे, तो समाज की नींव कमजोर होने लगती है।

वट वृक्ष भारतीय संस्कृति में दीर्घायु, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक है। उसकी विशाल जड़ें और विस्तृत शाखाएँ हमें यह प्रेरणा देती हैं कि परिवार भी ऐसा ही हो, जहाँ प्रत्येक सदस्य को सुरक्षा, स्नेह, सम्मान और अपनापन मिले। संयुक्त परिवार की परंपरा इसी भावना का जीवंत स्वरूप रही है। यहाँ केवल एक साथ रहना ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनना, अनुभवों का आदान-प्रदान करना और जीवन मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी जीवन का स्वाभाविक अंग है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने परिवारों में पुनः संस्कारों का रोपण करें। बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, प्रकृति से प्रेम करना, सेवा करना, कृतज्ञता व्यक्त करना, प्रार्थना करना और भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव का भाव भी सिखाएँ। संस्कार किसी पुस्तक से नहीं, बल्कि परिवार के वातावरण से जन्म लेते हैं। माता-पिता और दादा-दादी स्वयं अपने आचरण से जो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, वही बच्चों के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पाठशाला बन जाता है।

स्वामी ने कहा कि भोजन की मेज पर केवल भोजन न हो, बल्कि संवाद भी हो। घर में केवल आधुनिक उपकरण न हों, बल्कि प्रतिदिन कुछ समय प्रार्थना, भजन, सत्संग, स्वाध्याय और आत्मीय चर्चा के लिए भी निकाला जाए। यही छोटे-छोटे प्रयास परिवार को संस्कारों का तीर्थ बना सकते हैं।

वट पूर्णिमा हमें यह भी प्रेरणा देती है कि हम केवल अपने परिवार तक सीमित न रहें, बल्कि संपूर्ण समाज को अपना परिवार मानें। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना भारतीय संस्कृति का वैश्विक संदेश है। जब प्रत्येक परिवार प्रेम, सेवा, सहयोग और नैतिक मूल्यों का केंद्र बनेगा, तभी राष्ट्र सशक्त होगा और विश्व में शांति एवं सद्भाव का वातावरण स्थापित होगा।

आइए, इस वट पूर्णिमा पर हम सभी यह संकल्प लें कि अपने घरों में प्रेम, विश्वास, संवाद, सेवा, करुणा और सनातन मूल्यों का वटवृक्ष रोपित करे। परिवारों में एकता, समर्पण और संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित करे तथा आने वाली पीढ़ियों को ऐसा जीवन-दर्शन दें, जो उन्हें केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और चरित्रवान भी बनाए। प्रत्येक परिवार में सुख, शांति, समृद्धि, अखंड सौभाग्य एवं सनातन संस्कारों की अखंड ज्योति सदैव प्रज्वलित रहे। यही वट पूर्णिमा का संदेश और हमारी सांस्कृतिक विरासत का शाश्वत आह्वान है।

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