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2027 से पहले सपा में महाभूकंप! अखिलेश की सीक्रेट रिपोर्ट से बढ़ी दिग्गजों की टेंशन

क्या अखिलेश यादव 2027 से पहले सपा में सबसे बड़ा राजनीतिक ऑपरेशन चला रहे हैं? उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी खामोश हलचल चल रही है, जिसकी आवाज अभी बाहर नहीं आई है, लेकिन असर 2027 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दे सकता है। लखनऊ के गोमतीनगर में एक ऑफिस है बाहर से देखने पर बिल्कुल सामान्य। लेकिन अंदर बैठी एक टीम यूपी की 403 विधानसभा सीटों का राजनीतिक भविष्य लिख रही है। कौन विधायक बनेगा? किसका टिकट कटेगा? कौन सा दिग्गज घर बैठेगा? कौन सा नया चेहरा राजनीति का स्टार बनेगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या अखिलेश यादव इस बार अपनी पार्टी में वही गलती दोहराने वाले हैं, जिसने 2022 में सत्ता से दूर रखा था? या फिर 2027 के लिए समाजवादी पार्टी ने ऐसा मास्टर प्लान तैयार कर लिया है, जो यूपी की राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है?

समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनाव में अभी लगभग डेढ़ साल बाकी रहते ही उम्मीदवारों की खोज शुरू कर दी है। लेकिन इस बार तरीका पुराना नहीं है। इस बार टिकट मांगने वालों की भीड़ नहीं, बल्कि डेटा फैसला करेगा। सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव खुद 403 सीटों पर हो रहे सर्वे की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। पार्टी का साफ संदेश है “जो जीत सकता है, टिकट उसी को मिलेगा।” चाहे वह कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो। चाहे वह अखिलेश का करीबी ही क्यों न हो।

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरे मिशन की कमान किसी नेता के पास नहीं है। बल्कि यूपी के पूर्व मुख्य सचिव और रिटायर्ड IAS अधिकारी आलोक रंजन के पास है। आलोक रंजन वही अधिकारी हैं जिन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों हलकों में बेहद अनुभवी माना जाता है। सूत्र बताते हैं कि उनकी अगुआई में लखनऊ के गोमतीनगर में एक विशेष टीम बनाई गई है। इस टीम में शामिल हैं, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, रिसर्च स्कॉलर, डेटा एनालिस्ट, राजनीतिक फीडबैक एक्सपर्ट और कई फील्ड सर्वे एजेंसियां। इनका काम है, यूपी की हर सीट को माइक्रो लेवल पर समझना।

हर संभावित उम्मीदवार को लेकर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। रिपोर्ट में कुछ बेहद दिलचस्प सवाल हैं। पहला- क्या उम्मीदवार चुनाव जीत सकता है? सिर्फ लोकप्रिय होना काफी नहीं। क्या उसके पास जीतने का गणित भी है? दूसरा- क्या वह जातीय समीकरण में फिट बैठता है? यूपी की राजनीति में जाति आज भी सबसे बड़ा फैक्टर है। इसलिए हर सीट का अलग सामाजिक समीकरण देखा जा रहा है। तीसरा- जनता उसे पसंद करती है या नहीं? नेता खुद को लोकप्रिय मानता है। लेकिन जनता क्या सोचती है? यही सर्वे तय करेगा।

चौथा- क्या उसकी छवि साफ है? कोई बड़ा विवाद? कोई आपराधिक मामला? कोई भ्रष्टाचार का आरोप? सब जांचा जा रहा है। पांचवा- क्या उसका प्रभाव सिर्फ अपनी सीट तक सीमित है? या वह आसपास की सीटों को भी प्रभावित कर सकता है? असल में इस पूरी कवायद की जड़ 2022 का विधानसभा चुनाव है। उस चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीती थीं। भाजपा सत्ता में लौट आई थी। लेकिन हार के बाद पार्टी की आंतरिक समीक्षा में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। कई नेताओं ने माना कि टिकट वितरण में बड़ी गलतियां हुई थीं।

2022 में कई सीटों पर टिकट उन लोगों को मिला जो स्थानीय संगठन से ज्यादा बड़े नेताओं के करीबी थे। कई जगह पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई। कई जगह भाजपा और दूसरे दलों से आए नेताओं को सीधे टिकट दे दिया गया। नतीजा? जमीनी कार्यकर्ताओं में नाराजगी। बूथ मैनेजमेंट कमजोर और कई सीटों पर मामूली अंतर से हार। अगर 2022 में टिकट चयन सवालों में था तो 2024 लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण खुद खबर बन गया था।

मुरादाबाद में एसटी हसन का टिकट काटा गया। फिर नया चेहरा उतारा गया। स्थानीय स्तर पर बड़ा विवाद हुआ। मेरठ में कई दौर तक उम्मीदवार बदलते रहे। बदायूं में बदायूं पहले धर्मेंद्र यादव फिर शिवपाल यादव और फिर आखिर में आदित्य यादव। पूरे प्रदेश में चर्चा हो गई। वहीं, गौतमबुद्धनगर में अंतिम समय तक असमंजस बना रहा। इन घटनाओं ने पार्टी नेतृत्व को एहसास कराया कि आखिरी समय में उम्मीदवार बदलना राजनीतिक जोखिम बन सकता है। इसीलिए इस बार पहले से तैयारी शुरू कर दी गई है।

अब आते हैं सबसे बड़े राजनीतिक सवाल पर। सपा और कांग्रेस का गठबंधन। लोकसभा चुनाव 2024 में दोनों दलों ने मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद से लगातार चर्चा है कि 2027 में भी गठबंधन हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक आलोक रंजन की टीम ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि यदि गठबंधन होता है तो कांग्रेस को 70 से 75 सीटें दी जा सकती हैं। क्यों? क्योंकि 2022 में करीब 70 सीटों पर सपा का प्रदर्शन कमजोर रहा था। ऐसी सीटों पर कांग्रेस को मौका दिया जा सकता है।

लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं है। यूपी में कुछ सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस और सपा दोनों मजबूत दावेदारी पेश कर सकती हैं। जैसे सहारनपुर, अमरोहा, कुछ रोहिलखंड क्षेत्र की सीटें, पश्चिमी यूपी के मुस्लिम बहुल इलाके। कांग्रेस कहेगी, लोकसभा चुनाव में हमने अच्छा प्रदर्शन किया। हमें ज्यादा सीटें चाहिए। सपा कहेगी प्रदेश में मुख्य विपक्षी ताकत हम हैं। सीटें कम नहीं होंगी। यहीं से शुरू हो सकती है असली राजनीतिक खींचतान।

अखिलेश यादव लगातार PDA यानी पिछड़ा + दलित + अल्पसंख्यक की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन सिर्फ नारा देने से चुनाव नहीं जीते जाते। उम्मीदवार भी उसी सामाजिक समीकरण में फिट होना चाहिए। इसलिए सर्वे में सिर्फ लोकप्रियता नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता भी देखी जा रही है। यह सवाल आज सपा के अंदर सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। क्योंकि अगर सर्वे ही सब कुछ तय करेगा तो कई दिग्गज नेताओं की मुश्किल बढ़ सकती है।

वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि अखिलेश यादव अब व्यक्ति नहीं, सीट पर फोकस कर रहे हैं। उन्हें चुनाव जीतना है। इसलिए अगर किसी बड़े नेता की जीत की संभावना कम होगी तो उसका टिकट कट भी सकता है। यानी 2027 में सपा के भीतर सबसे बड़ा संघर्ष भाजपा से पहले टिकट के लिए होने वाला है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा वर्षों से इसी तरह का डेटा आधारित मॉडल इस्तेमाल करती रही है। हर चुनाव से पहले फीडबैक, सर्वे, संगठन रिपोर्ट और स्वतंत्र एजेंसियों की रिपोर्ट तैयार होती है।

कांग्रेस भी लंबे समय से यह मॉडल अपनाती रही है। अब सपा भी उसी रास्ते पर बढ़ती दिख रही है। यानी यूपी की राजनीति धीरे-धीरे “जाति प्लस डेटा” मॉडल की ओर बढ़ रही है। मायावती भी संगठन मजबूत करने में जुटी हैं। पुराने नेताओं की वापसी कराई जा रही है। ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित समीकरण पर काम हो रहा है। लेकिन अगर सपा सही उम्मीदवार चुनने में सफल रही तो बसपा के लिए राजनीतिक स्पेस और सीमित हो सकता है।

यूपी चुनाव 2027 में कई परतें होंगी। भाजपा का संगठन, सपा का PDA, कांग्रेस का विस्तार, बसपा की वापसी की कोशिश, छोटे दलों की भूमिका और इन सबके बीच डेटा की राजनीति। क्या सर्वे सच में जीत दिलाते हैं? या फिर जमीन की राजनीति अभी भी डेटा से बड़ी है? क्या एक रिपोर्ट जनता का मूड समझ सकती है? क्या जातीय समीकरणों से ऊपर विकास और स्थानीय मुद्दे जा पाएंगे?

और सबसे अहम क्या अखिलेश यादव इस बार टिकट वितरण की वही गलती नहीं दोहराएंगे, जो 2022 में भारी पड़ी थी? क्योंकि 2027 का चुनाव अभी दूर जरूर है लेकिन उम्मीदवारों की जंग शुरू हो चुकी है। और इस बार फैसला मंच पर नहीं डेटा की फाइलों में लिखा जा रहा है।

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