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नियुक्ति के मुहाने पर अटके 68 चिकित्सक: आयुष तंत्र में फाइलों का जाम या इच्छाशक्ति का अभाव?

गाजियाबाद। प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के एक अपेक्षाकृत शांत दिखने वाले हिस्से—होम्योपैथी विभाग—में इन दिनों एक असहज सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा साधारण नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ठहराव का प्रतीक बन चुका है, जिसने 68 चयनित चिकित्सकों के भविष्य को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है।

ये वे अभ्यर्थी हैं जिन्होंने कठिन प्रतिस्पर्धा, लिखित परीक्षा, साक्षात्कार और बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया की हर कसौटी को पार किया। मई 2025 में अंतिम परिणाम घोषित हुआ, सभी औपचारिकताएँ—दस्तावेज सत्यापन, चिकित्सकीय परीक्षण और पुलिस जांच—समय पर पूरी कर ली गईं। इतना ही नहीं, सूत्रों के अनुसार नियुक्ति-पत्र भी तैयार हैं।

फिर सवाल उठता है—जब सब कुछ पूरा है, तो नियुक्ति क्यों नहीं?
सात महीने का ठहराव: प्रक्रिया पूरी, निर्णय अधूरा
परिणाम घोषित होने के बाद जहाँ अभ्यर्थियों ने सरकारी सेवा में प्रवेश की उम्मीदों को आकार देना शुरू किया था, वहीं अचानक पूरी प्रक्रिया मानो थम सी गई। सात महीनों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन नियुक्ति-पत्र वितरण अब भी अधर में लटका हुआ है।

यह देरी महज तकनीकी बाधा है या फिर निर्णय लेने की कमी?
यह प्रश्न अब केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह सीधे-सीधे शासन की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा कर रहा है।
चिकित्सकों की त्रासदी: नौकरी छोड़ी, भविष्य भी अधर में
स्थिति का सबसे कड़ा असर उन चयनित चिकित्सकों पर पड़ा है, जिन्होंने सरकारी सेवा जॉइन करने की उम्मीद में अपनी पूर्व नौकरियाँ छोड़ दीं। आज वे आर्थिक असुरक्षा, मानसिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच झूल रहे हैं।

हर दिन उनके सामने एक ही सवाल खड़ा होता है—
‘क्या चयनित होना ही अंतिम उपलब्धि थी, या नियुक्ति सिर्फ एक अधूरी उम्मीद बनकर रह जाएगी?’

व्यवस्था पर सवाल: अदृश्य अवरोध या प्रशासनिक जड़ता?
पूरा घटनाक्रम एक गहरे सवाल को जन्म देता है—क्या शासनिक तंत्र में ऐसी अदृश्य बाधाएँ हैं, जो पूरी हो चुकी प्रक्रियाओं को भी रोक देती हैं?

या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता का वह चेहरा है, जहाँ फाइलों का ठहर जाना सामान्य बात बन चुका है?

अब निगाहें शीर्ष नेतृत्व पर

इस मुद्दे ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर गंभीरता हासिल कर ली है। निगाहें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर टिक गई हैं।

यह मामला अब सिर्फ 68 चिकित्सकों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा—यह शासन की संवेदनशीलता, जवाबदेही और युवाओं के प्रति प्रतिबद्धता की सीधी परीक्षा बन चुका है।

सवाल अब भी वही है:
जब प्रक्रिया पूरी है, तो नियुक्ति क्यों नहीं?
और अगर जवाब नहीं है, तो आखिर जिम्मेदार कौन?
ये वे अभ्यर्थी हैं जिन्होंने कठिन प्रतिस्पर्धा, लिखित परीक्षा, साक्षात्कार और बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया की हर कसौटी को पार किया। मई 2025 में अंतिम परिणाम घोषित हुआ, सभी औपचारिकताएँ—दस्तावेज सत्यापन, चिकित्सकीय परीक्षण और पुलिस जांच—समय पर पूरी कर ली गईं। इतना ही नहीं, सूत्रों के अनुसार नियुक्ति-पत्र भी तैयार हैं।

फिर सवाल उठता है—जब सब कुछ पूरा है, तो नियुक्ति क्यों नहीं?
सात महीने का ठहराव: प्रक्रिया पूरी, निर्णय अधूरा परिणाम घोषित होने के बाद जहाँ अभ्यर्थियों ने सरकारी सेवा में प्रवेश की उम्मीदों को आकार देना शुरू किया था, वहीं अचानक पूरी प्रक्रिया मानो थम सी गई।

सात महीनों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन नियुक्ति-पत्र वितरण अब भी अधर में लटका हुआ है। यह देरी महज तकनीकी बाधा है या फिर निर्णय लेने की कमी? यहां पर यह भी जान लीजिए कि 68 में से 53 होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर (एमओ) + 15 होम्योपैथिक रेज़िडेंट मेडिकल ऑफिसर (आरएमओ) हैं।

यह प्रश्न अब केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह सीधे-सीधे शासन की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा कर रहा है।
चिकित्सकों की त्रासदी: नौकरी छोड़ी, भविष्य भी अधर में
स्थिति का सबसे कड़ा असर उन चयनित चिकित्सकों पर पड़ा है, जिन्होंने सरकारी सेवा जॉइन करने की उम्मीद में अपनी पूर्व नौकरियाँ छोड़ दीं। आज वे आर्थिक असुरक्षा, मानसिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच झूल रहे हैं।

हर दिन उनके सामने एक ही सवाल खड़ा होता है—
‘क्या चयनित होना ही अंतिम उपलब्धि थी, या नियुक्ति सिर्फ एक अधूरी उम्मीद बनकर रह जाएगी?’

व्यवस्था पर सवाल: अदृश्य अवरोध या प्रशासनिक जड़ता?
पूरा घटनाक्रम एक गहरे सवाल को जन्म देता है—क्या शासनिक तंत्र में ऐसी अदृश्य बाधाएँ हैं, जो पूरी हो चुकी प्रक्रियाओं को भी रोक देती हैं?

या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता का वह चेहरा है, जहाँ फाइलों का ठहर जाना सामान्य बात बन चुका है?

अब निगाहें शीर्ष नेतृत्व पर

इस मुद्दे ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर गंभीरता हासिल कर ली है। निगाहें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर टिक गई हैं।

यह मामला अब सिर्फ 68 चिकित्सकों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा—यह शासन की संवेदनशीलता, जवाबदेही और युवाओं के प्रति प्रतिबद्धता की सीधी परीक्षा बन चुका है।
सवाल अब भी वही है:

जब प्रक्रिया पूरी है, तो नियुक्ति क्यों नहीं?
और अगर जवाब नहीं है, तो आखिर जिम्मेदार कौन?

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