देश में पिछले कुछ वर्षों से कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद उठते रहे हैं। साल 2026 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET समेत कुछ अन्य परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोप लगे हैं। इसके बाद विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है। हालांकि, केंद्र सरकार इन मांगों पर चुप रही है।
इसी बहस के बीच एक बड़ा सवाल फिर से चर्चा में आ गया है। सवाल यह है कि आरोपों या विवादों के बाद केंद्र सरकारों में मंत्रियों की जवाबदेही का रिकॉर्ड कैसा रहा है? अगर पिछले 20 साल के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) और नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) सरकारों में इस्तीफों को लेकर अलग-अलग तस्वीर देखने को मिलती है।
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UPA सरकार में कई मंत्रियों ने छोड़ी थी कुर्सी
2004 से 2014 के बीच UPA सरकार के दौरान कई केंद्रीय मंत्रियों को विवादों और आरोपों के चलते अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। खासकर UPA-2 के समय इस तरह के इस्तीफों की संख्या ज्यादा देखने को मिली। इस दौरान दूरसंचार मंत्री ए राजा (14 नवंबर 2010), दयानिधि मारन (July 2011), विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर (अप्रैल 2010), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री वीरभद्र सिंह (2011), रेल मंत्री पवन कुमार बंसल और कानून मंत्री अश्विनी कुमार जैसे बड़े नामों को इस्तीफा देना पड़ा।
इन इस्तीफों के पीछे 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस केस, IPL विवाद, भ्रष्टाचार के आरोप और कोयला घोटाला (कोलगेट) जैसे बड़े मामले थे। उस समय विपक्ष के दबाव और जनता की नाराजगी के चलते सरकार को कई मंत्रियों से इस्तीफा लेने या दिलवाने पड़े थे।
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NDA में इस्तीफे की मांगें ज्यादा, इस्तीफे कम
2014 में NDA सरकार बनने के बाद कई बार केंद्रीय मंत्रियों को लेकर इस्तीफे की मांग उठती रही है। सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी, अजय मिश्रा टेनी और अश्विनी वैष्णव जैसे कई मंत्रियों पर अलग-अलग समय पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए। इन मामलों में आमतौर पर किसी भी मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया और सरकार ने भी उनका बचाव किया। यहां तक कि मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार कहा था कि यह NDA है, UPA नहीं।
वहीं NDA कार्यकाल में अगर इस्तीफा देने वाले केंद्रीय मंत्रियों की बात करें तो सबसे बड़ा नाम विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर का आता है। #MeToo आंदोलन के दौरान उन पर कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इसके बाद अक्टूबर 2018 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। NDA सरकार के दौरान एक पैटर्न यह भी देखने को मिला कि विवादों में घिरे मंत्रियों को अक्सर तुरंत हटाने की बजाय या तो कैबिनेट फेरबदल में बाहर किया जाता है या फिर अगले चुनाव में उन्हें टिकट नहीं दिया जाता।












