Homeदेश (National)स्कूल छोड़ते बच्चे, शिक्षक नदारद, नीति आयोग ने क्या खमियां गिनाई हैं?

स्कूल छोड़ते बच्चे, शिक्षक नदारद, नीति आयोग ने क्या खमियां गिनाई हैं?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ एजुकेशन डिवीजन, 2026 की रिपोर्ट में बताया है कि कक्षा 1 से 5वीं तक की पढ़ाई करने वाले 0.3 प्रतिशत छात्र, हर साल स्कूल छोड़ देते हैं। 5वीं से 8वीं तक की पढ़ाई करने वाले 3.5 प्रतिशत छात्र, 9वीं की पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई करने वाले 11.5 फीसदी छात्र, हायर सेकेंड्री में आकर, पढ़ाई छोड़ देते हैं।

पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा 20 फीसदी बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में 18.3 फीसदी बच्चे स्कूलों छोड़ देते हैं। असम में 17.5 फीसदी, मिजोरम और मेघालय 17.4 फीसदी बच्चे, 9वीं से 12वीं के बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं।

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राज्यवार क्या आंकड़े हैं?

गुजरात में 16.9 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 16.8 प्रतिशत लोगों ने पढ़ाई छोड़ी है। लद्दाख में 16.2 फीसदी बच्चे सेकेंड्री एजुकेशन से आगे नहीं बढ़ बाते हैं। आंध्र प्रदेश में यह दर 15.5 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 15.3 प्रतिशत, ओडिशा में 15 प्रतिशत, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर यह दर 12-15 प्रतिशत के आसपास है।

किन राज्यों में सुधार दिखा है?

साल 2024 से 2025 की रिपोर्ट बताती है कि चंडीगढ़, झारखंड, लक्षद्वीप, उत्तराखंड और केरल जैसे राज्यों ने सुधार दिखाया गया है। यहां सेकेंड्री एजुकेशन में स्कूल छोड़ने की दर दूसरे राज्यों की तुलना में कम है।

  • झारखंड: 3.5 प्रतिशत
  • लक्षद्वीप: 4.1 प्रतिशत
  • चंडीगढ़: 2.0 प्रतिशत
  • केरल: 4.8 प्रतिशत
  • उत्तराखंड: 4.6 प्रतिशत
  • शिक्षकों की कमी भी खाली होते स्कूलों की एक वजह

नीति आयोग ने माना है कि शिक्षकों की कमी की वजह से भी स्कूलों से छात्रों का मोहभंग हो रहा है। बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा पद रिक्त हैं। बिहार में 2.08 लाख से ज्यादा पद प्राथमिक स्तर पर रिक्त हैं, 5वीं से 8वीं तक के स्कूलों में 36,035 पद रिक्त हैं, वहीं 33,035 पद, 8वीं से 12वीं तक के शिक्षकों के लिए रिक्त हैं। सिर्फ प्राइमरी स्कूलों पर गौर करें तो हरियाणा में 7626, हिमाचल प्रदेश में 2654, झारखंड में 80,341 पद और कर्नाटक में 29437 पद रिक्त हैं।

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स्कूल छोड़ने के बढ़ते मामलों पर सरकार क्या सोचती है?

  • न कमरे, न पद, चेक बैलेंस की कमी: ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ की रिपोर्ट में उन खामियों के बारे में भी बात की गई है, जिनकी वजह से स्कूलों की ऐसी हालत है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्राइमरी से लेकर सेकेंड्री एजुकेशन तक के स्कूलों में स्थानीय स्तर पर सरकारी समर्थन कमजोर है। कहीं स्कूलों में पद रिक्त हैं, कहीं स्कूलों में कमरे नहीं हैं, कहीं सही चेक और बैलेंस नहीं है।
  • ब्लॉक और जिला स्तर पर 60% पद रिक्त: ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली केंद्र से लेकर पंचायत स्तर तक बिखरी हुई शासन व्यवस्था, पदों को लेकर अस्पष्टता और भारी रिक्तियों से जूझ रही है। ब्लॉक और जिला स्तर पर 50-60 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे निगरानी और सहयोग दोनों प्रभावित हो रहे हैं।’
  • स्कूलों में पढ़ाने की गुणवत्ता पर सवाल: नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हेड मास्टर या प्रिंसिपल अक्सर बड़े अधिकारियों के निर्देशों को लागू करने वाले निष्क्रिय कार्यकर्ता बनकर रह जाते हैं, जबकि स्थानीय जरूरतों के अनुसार बदलाव करने की स्वायत्तता ही नहीं है। निरीक्षण भी सिर्फ आदेशों को मानने तक सीमित है, शिक्षण और सीखने की गुणवत्ता नहीं है।’
  • पढ़ाने के अलावा दूसरे कामों में लगे शिक्षक: नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘शिक्षक तैनाती में गंभीर असमानता बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, पढ़ाई के अलावा, दूसरे कामों का अतिरिक्त बोझ, अपर्याप्त प्रशिक्षण शिक्षकों की गुणवत्ता प्रभावि कर रहे हैं।’
  • 70 फीसदी अंक हासिल नहीं कर पाते शिक्षक: ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ रिपोर्ट में नीति आयोग ने कहा है कि स्कूलों में किसी विषय के विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी दिखती है। कई शिक्षक ऐसे हैं, जो जिन विषयों को पढ़ाते हैं, उसमें 60 से 70 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल नहीं पाते हैं।

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चिंता की बात क्या है?

सरकारी स्कूलों से अभिभावकों का मोहभंग हो रहा है। साल 2005 में 71 फीसदी नामांकन अब घटकर 49 फीसदी रह गया है। कम फीस वाले प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल है। पाठ्यक्रम, शिक्षण शैली और मूल्यांकन में गहरी असामनता है। स्कूलों में परीक्षाओं से पहले किताब खत्म करने वाली मानसिकता की वजह से बच्चों में बुनियादी समझ बन ही नहीं पा रही है। AI को तीसरी कक्षा से शुरू करने की पहल हुई है लेकिन उसे छात्रों को समझाने में शिक्षकों की क्षमता भी सवालों के घेरे में है। नीति आयोग ने माना है कि शिक्षक प्रबंधन और पढ़ाने के तरीकों में गहरी खामियां स्कूली शिक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं।

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