ऋषिकेश। आज माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन जहां स्वयं देवाधिदेव महादेव अपनी अनन्त कृपा के साथ विराजमान हैं। ऐसे दिव्य वातावरण में गूंजते वैदिक मंत्र, शिवभक्ति से ओतप्रोत भजन और माँ गंगा की अविरल धारा के मध्य पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में “सोमनाथ अमृत महोत्सव” मनाया गया जो भारत की सनातन आत्मा के पुनर्जागरण का दिव्य प्रतीक है।
श्री सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में दिव्य एवं भव्य “सोमनाथ अमृत महोत्सव” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं पूज्या साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भगवान शिव का विशेष पूजन एवं माँ गंगा के पवित्र जल से महा-अभिषेक किया। परमार्थ गुरूकुल के आचार्यो, ऋषिकुमारों और स्वर्गाश्रम जौंक के पदाधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों ने इस दिव्य महोत्सव में सहभाग किया।
यह उन हजार वर्षों की अमर चेतना का अभिषेक है, जिसने अनगिनत आक्रमणों, संघर्षों और विध्वंस के प्रयासों के बाद भी भारत की आत्मा को झुकने नहीं दिया। आज का यह महोत्सव उस सनातन ज्योति का उत्सव है, जो युगों से प्रज्ज्वलित है और आने वाले सहस्राब्दियों तक सम्पूर्ण मानवता का मार्ग आलोकित करती रहेगी।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की अमर चेतना का शाश्वत घोष है। यह वह दिव्य ध्वजा है, जो समय के तूफानों के मध्य भी अडिग खड़ी रही। इतिहास ने अनेक बार सोमनाथ को मिटाने का प्रयास देखा, किन्तु हर बार महादेव ने स्वयं उसे और अधिक तेजस्वी स्वरूप में पुनः स्थापित किया। सोमनाथ का यही संदेश है कि सत्य और श्रद्धा को कभी पराजित नहीं किया जा सकता।”
स्वामी ने कहा कि वर्ष 2026 में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए प्रथम आक्रमण के 1000 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इन हजार वर्षों में यदि कुछ अडिग रहा है तो वह केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, सनातन संस्कृति और करोड़ों श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है। समुद्र की अनंत लहरों के मध्य आज भी खड़ा सोमनाथ सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश दे रहा है कि सभ्यताएँ तलवारों से नहीं, संस्कारों से जीवित रहती हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों से पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ पर पावनधाम सोमनाथ की ऊर्जा सम्पूर्ण भारत को एक नई आध्यात्मिक चेतना प्रदान कर रही है। जिस प्रकार भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने पुनर्निर्मित मंदिर के उद्घाटन के समय राष्ट्र की आत्मा के पुनर्जागरण का अनुभव किया होगा, उसी दिव्यता का अनुभव आज प्रत्येक श्रद्धालु कर रहा है।
साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि सोमनाथ केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानवता को यह स्मरण कराने वाली जीवंत प्रेरणा है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीपक सम्पूर्ण दिशा बदल सकता है। सोमनाथ वही दीप है, जिसने हजार वर्षों तक भारत की चेतना को प्रकाशित रखा।
उन्होंने कहा कि आज विश्व को केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दिशा की आवश्यकता है और भारत की सनातन संस्कृति ही वह प्रकाश है, जो सम्पूर्ण मानवता को शांति, करुणा और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखा सकती है।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्पंदन है। यह वह चेतना है, जो हर भारतीय के भीतर राष्ट्रप्रेम, श्रद्धा और आत्मबल की ज्योति प्रज्वलित करती है। आज का “सोमनाथ अमृत महोत्सव” केवल अतीत का स्मरण नहीं था, बल्कि आने वाले हजार वर्षों के भारत के लिए एक आध्यात्मिक संकल्प भी है, ऐसा भारत जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, अपनी संस्कृति पर गर्व करता हो और विश्व को शांति, प्रेम एवं आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाता हो।












