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न न करते कैसे जंग में कूदा सऊदी अरब? कूटनीति और पाकिस्तान… कुछ भी नहीं आया काम

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग में खाड़ी देशों की कोशिश बचने की रही है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ कूटनीति का सहारा लिया। पिछले साल एक रक्षा समझौता भी किया, ताकि तेहरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके। तमाम कोशिशों की बावजूद सऊदी अरब की जंग में एंट्री हो चुकी है। हालांकि यह तेहरान और रियाद के बीच कोई प्रत्यक्ष जंग नहीं है। ईरान के प्रॉक्सी ने रियाद के खिलाफ नया मोर्चा खोला तो जवाब में सऊदी अरब ने भी बमबारी की। लेकिन दुनियाभर के विशेषज्ञों को अब युद्ध के अन्य क्षेत्रों में फैलने का खतरा सताने लगा है।

सऊदी अरब और ईरान के बीच नहीं बनती है। यह सबको पता है। जंग शुरू होने से पहले ही ईरान ने सभी खाड़ी देशों को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने अपनी जमीन को ईरान के खिलाफ हमला करने में अमेरिका को इस्तेमाल करने की अनुमति दी तो तेहरान उन पर भी हमला करेगा। नतीजा यह हुआ कि अधिकांश खाड़ी देशों ने अमेरिका को ईरान पर हमला करने की अनुमति नहीं दी। लंबे समय तक कूटनीतिक रास्ता अपनाने का दबाव बनाया। अमेरिका ने इन देशों की जमीन का इस्तेमाल सिर्फ रक्षात्मक उपायों में किया।

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कूटनीति से बचता रहा सऊदी अरब

युद्ध के पहले और दूसरे चरण में ईरान ने सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात पर हमला किया। अधिकांश हमले अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए थे। अन्य देशों की अपेक्षा सऊदी अरब पर हमले सीमित थे। कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ।

रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि पाकिस्तान सेना प्रमुख ने इसी साल मार्च महीने में ईरान और सऊदी अरब के बीच एक गुप्त समझौता करवाया था। इसके तहत आईआरजीसी के मुखिया को पाकिस्तान के रास्ते अवैध ईरानी तेल के कारोबार की अनुमति मिली। आसिम मुनीर से जुड़ी एक कंपनी को पूरा काम सौंपा गया। दोनों देशों के जनरलों ने खूब मुनाफा कमाया। बदले में सऊदी अरब पर कोई हमला नहीं करने पर सहमति बनी।

जुलाई महीने में ईरान ने पहली बार सऊदी अरब पर मिसाइल दागी। इस पर पाकिस्तान ने नाराजगी जताई और समझौते को खतरे में डालने की धमकी दी। इसके बाद ईरान ने सऊदी अरब के प्रति संयम बरता।

अमेरिका पर बनाया बातचीत का दबाव

युद्ध शुरू होने के बाद से ही सऊदी अरब ने भी संयम का परिचय दिया। उसने अमेरिका पर बातचीत करने का दबाव बनाया। युद्ध की जगह वार्ता को महत्व देने पर जोर दिया। सऊदी अरब ने कई मौकों पर कहा कि जंग में उसे नहीं घसीटा जाना चाहिए। रियाद के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह जंग उनकी नहीं है। अगर उलझे तो उनका ही नुकसान होगा। यही कारण है कि सऊदी अरब ने अमेरिका पर कूटनीतिक हल निकालने का खूब दबाव बनाया।

कहां से बिगड़ी सऊदी अरब की बात?

13 जुलाई को सना एयरपोर्ट पर हमला एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। हूती विद्रोहियों का आरोप है कि यह हमला सऊदी अरब के कहने पर यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार ने किया। जवाबी कार्रवाई में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के आभा एयरपोर्ट हमला किया। तेल संयंत्र को निशाना बनाया और 20 जुलाई को लाल सागर पर सऊदी अरब की नाकेबंदी की घोषणा की। जवाब में सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के सैन्य ठिकानों पर बमबारी की। यहीं से ईरान के प्रॉक्सी और सऊदी अरब के बीच बात बिगड़ गई।

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सऊदी के हमलों से बढ़ा युद्ध का खतरा

हूती विद्रोहियों के साथ एकजुटता दिखाने के उद्देश्य से इराक में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया ने भी सऊदी अरब के तेल सुविधा पर हमला बोल दिया। जवाब में सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ मिलकर ‘पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज’ के ठिकानों पर भीषण बमबारी की। यह तीसरी बार था जब इराक से सऊदी अरब पर हमला किया गया। मगर सबसे हैरान की बात यह रही कि सऊदी अरब ने पहली बार सैन्य प्रतिक्रिया दी।

क्या ईरान से सीधा भिड़ेगा सऊदी अरब?

इराक में भीषण बमबारी के बाद जंग के लाल सागर में हूती और बगदाद में ईरान समर्थित प्रॉक्सी तक फैलने का खतरा बढ़ गया है। विश्लेशकों का मानना है आज सऊदी अरब भले ही तेहरान के प्रॉक्सी से लड़ रहा है, लेकिन आने वाले दिनों में उसे प्रत्यक्ष तौर पर ईरान से भी लड़ना पड़ सकता है, क्योंकि इन समूहों को सैन्य साजो-सामान तेहरान से ही भेजा जाता है।

सऊदी अरब के साथ तनाव बढ़ने की आशंका इस वजह से भी है कि ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज एजेंसी मेहर के मुताबिक सऊदी अरब और अमेरिका के हमलों में आईआरजीसी के चार सदस्यों की जान गई है। बदले में ईरान जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

क्या युद्ध का केंद्र बनेगा लाल सागर?

सऊदी अरब को पूर्व में हूती विद्रोहियों ने घेर रखा है। उत्तर-पश्चिम में इराकी मिलिशिया ने। खास बात यह है कि ईरान के ये प्रॉक्सी सऊदी अरब के तेल केंद्रों को निशाना बना रहे हैं, जो रियाद के लिए बेहद संवेदनशील है, क्योंकि उसकी पूरी अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी है। तेल केंद्रों पर हमलों को रियाद किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा। उधर, नाकेबंदी के अलावा हूती विद्रोहियों ने लाल सागर पर टोल लगाने पर भी विचार करना शुरू कर दिया है। अगर ऐसा हुआ तो सऊदी अरब के साथ तनाव बढ़ना बिल्कुल तय है, क्योंकि होर्मुज के ठप होने के बाद से सऊदी अरब अपना अधिकांश तेल लाल सागर के रास्ते निर्यात करता है।

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