सीनियर वकील और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की नई किताब इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने अपनी किताब में न्यायपालिका में जजों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कुछ जजों का रवैया सही नहीं है। उन्होंने किताब में दुनिया भर में वकीलों की तरफ से जजों के लिए जताई जाने वाली श्रद्धा को लेकर कई प्रश्न खड़े किए हैं। उनकी इस किताब ने न्यायिपालिका को लेकर एक बार फिर से बहस तेज कर दी है।
दरअसल, उन्होंने कहा कि अदालतों में जजों को जरूरत से ज्यादा सम्मान देने की परंपरा कभी-कभी उल्टा असर डालती है। इससे कुछ जजों में एक तरह की श्रेष्ठता की भावना आ जाती है और उनका व्यवहार दबाव बनाने वाला हो सकता है। उन्होंने लिखा कि कुछ जजों में दिव्यता का ‘अनूठा एहसास’ पैदा हो गया है।
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कैसे उठा पूरा मामला?
यह पूरी बहस तुषार मेहता की किताब ‘द बेंच, द बार एंड द बिजार’ से शुरू होती है। इस किताब में तुषार मेहता ने कहा कि कुछ मामलों में जजों का रवैया ऐसा हो जाता है कि वकीलों के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि न्यायपालिका में संतुलन और जवाबदेही बनाए रखना जरूरी है, ताकि सभी पक्षों को बराबर मौका मिल सके। उन्होंने विदेशी अदालतों का जिक्र करते हुए ‘बेंच की दादागिरी’ थीम का जिक्र किया।
जजों की कार्यशैली पर उठाए सवाल
तुषार मेहता ने कहा है कि न्यायिक दादागिरी कई रूप ले सकती है। कुछ जज वकीलों की बात लगातार काटते हैं, तो कुछ सख्ती की हद पार करके अपमान करने पर उतर आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और जनता को इससे सर्वोच्च स्तर की निष्पक्षता और मर्यादा की उम्मीद होती है। ऐसे में अगर किसी भी स्तर पर व्यवहार में कमी आती है, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
जजों को सम्मान देने के तरीकों पर सवाल
तुषार मेहता ने अपनी किताब में अदालत के अंदर जजों को सम्मान देने के तरीकों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर बेंच की ओर से कोई बेतुकी कानूनी बात भी कही जाती है, तो वकील पहले ‘हम माननीय न्यायाधीश के सामने नतमस्तक हैं’ कहकर उसका जवाब देते हैं। इसके बाद वकील कोर्ट में कोई प्रस्ताव पेश करने की हिम्मत कर पाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और जनता को इससे सर्वोच्च स्तर की निष्पक्षता और मर्यादा की उम्मीद होती है। ऐसे में अगर किसी भी स्तर पर व्यवहार में कमी आती है, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
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कानूनी जगत में बढ़ी हलचल
यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका के कामकाज पर सवाल उठे हों। पहले भी कई बार जजों के व्यवहार, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। तुषार मेहता एक जाने-माने वकील हैं और उनकी इस किताब के बाद वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे एक जरूरी बहस मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि इस तरह की बातें न्यायपालिका की छवि पर असर डाल सकती हैं।












