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थानों के अंधे कोनों में खोई निगरानी की सच्चाई,सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब

  • कागजों में कैमरे, हकीकत में बंद पड़ी सिस्टम की आंखें

लखनऊ। पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी महज एक प्रशासनिक समीक्षा नहीं, बल्कि उस सच्चाई की परतें खोलने की कोशिश है जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है। यह कहानी सिर्फ कैमरों के लगने या न लगने की नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की है जिसमें जवाबदेही अक्सर फाइलों में कैद होकर रह जाती है। देश में पुलिस सुधारों की बात हर कुछ  साल में उठती है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव की रफ्तार अक्सर धीमी ही रहती है।

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया था कि हर थाने में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग वाले सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, ताकि हिरासत में होने वाली घटनाओं पर नजर रखी जा सके। यह आदेश एक बड़े सामाजिक संदर्भ में आया था, जब पुलिस हिरासत में मौतों और कथित ज्यादतियों की खबरें लगातार सामने आ रही थीं लेकिन छह साल बाद भी हालात यह हैं कि कई थानों में कैमरे या तो लगे नहीं हैं, या फिर वे काम नहीं कर रहे। यहीं से शुरू होती है इस स्पेशल स्टोरी की असली पड़ताल। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने इस पूरे मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है, जहां फंड, फैसले और फील्ड के बीच का अंतर साफ दिखाई दे रहा है।जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र और राज्य सरकारों से सीधे-सीधे जवाब मांगा है कि थानों में सीसीटीवी लगाने के लिए जारी फंड का इस्तेमाल आखिर कैसे और कहां हुआ। अदालत ने एमिकस क्यूरी सिद्धार्थ दवे को निर्देश दिया है कि वे 6 मई को केंद्र और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के गृह सचिवों के साथ बैठक करें। इस बैठक में गृह सचिव स्तर के अधिकारी या कम से कम संयुक्त सचिव/अतिरिक्त सचिव रैंक के प्रतिनिधि की मौजूदगी अनिवार्य होगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस बैठक का मुख्य एजेंडा केवल फंड के उपयोग की समीक्षा होगा और इसकी विस्तृत रिपोर्ट 13 मई को अदालत में पेश की जाएगी। यह रुख बताता है कि अदालत अब केवल आदेश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए भी उतनी ही गंभीर है।

दरअसल, फंडिंग मॉडल यह स्पष्ट करता है कि संसाधनों की कोई बड़ी कमी नहीं थी। केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा खर्च केंद्र उठाता है, पहाड़ी राज्यों में 90 फीसदी और अन्य राज्यों में 60 फीसदी तक योगदान दिया जाता है। इसके बावजूद यदि कैमरे काम नहीं कर रहे, तो सवाल सीधा प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर उठता है। क्या कहीं यह परियोजना प्राथमिकता सूची में पीछे धकेल दी गई? या फिर इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी रही? 

इस पूरे मुद्दे का सबसे संवेदनशील पहलू पुलिस हिरासत में होने वाली घटनाएं हैं। जब निगरानी के लिए बनाए गए उपकरण ही निष्क्रिय हों, तो न्याय की प्रक्रिया कमजोर हो जाती है। सीसीटीवी कैमरे यहां सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का एक अहम माध्यम हैं। उनकी अनुपस्थिति या खराब स्थिति सीधे-सीधे भरोसे के संकट को जन्म देती है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख इस बार अलग है। अदालत अब केवल निर्देश देने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि यह जानना चाहती है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है। एमिकस क्यूरी और गृह सचिवों की बैठक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यह बैठक न केवल फंड के इस्तेमाल का हिसाब देगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि आगे की राह क्या होगी।

दरअसल, यह मामला अब एक तकनीकी खामी से कहीं आगे निकल चुका है। यह शासन की पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन की परीक्षा बन गया है। आने वाली रिपोर्ट यह तय करेगी कि क्या यह सिस्टम खुद को सुधारने के लिए तैयार है या फिर यह भी उन योजनाओं की सूची में शामिल हो जाएगा, जो कागजों पर तो पूरी हैं, लेकिन जमीन पर अधूरी।

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