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कहां गई जिम्मेदारी? नहरों के बीच बसा शहर, किनारों पर सुरक्षा का संकट

  • हादसों का इतिहास फिर भी नहर किनारे सुरक्षा इंतजाम अधूरे
  • लखनऊ में कई जगह सड़कें सीधे नहरों के मुहाने पर, सुरक्षा दीवार व बैरियर का अभाव
  • रेस्क्यू के लिए एसडीआरएफ मौजूद, मगर शुरुआती मिनटों की जिम्मेदारी अब भी तय नहीं

लखनऊ। राजधानी की नहरों का नेटवर्क शहर और आसपास के इलाकों की जरूरत पूरी करता है, लेकिन इनके किनारे मौजूद कई रास्ते और पुलिया दुर्घटनाओं के लिहाज से गंभीर खतरा बने हुए हैं। कई स्थानों पर सड़क और नहर के बीच सुरक्षा का पर्याप्त अंतर नहीं है। कहीं रेलिंग कमजोर या अनुपस्थित है तो कहीं नहर किनारे खुला हिस्सा सीधे आवागमन वाले मार्ग से जुड़ा है। ऐसे में वाहन का संतुलन बिगड़ने या किसी व्यक्ति के फिसलकर नहर में गिरने पर बचाव के लिए शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सवाल यह है कि क्या राजधानी की नहरों के सभी ऐसे संवेदनशील स्थानों को चिह्नित कर उनके लिए स्थायी सुरक्षा योजना तैयार की गई है? लखनऊ में इंदिरा नहर और शारदा नहर प्रणाली से जुड़े क्षेत्रों में पहले भी गंभीर हादसे हो चुके हैं। वर्ष 2019 में नगराम क्षेत्र में इंदिरा नहर में पिकअप वाहन गिरने से सात बच्चों की मौत हुई थी। इस हादसे के बाद बड़े पैमाने पर बचाव अभियान चलाना पड़ा था। वर्ष 2021 में भी नगराम क्षेत्र में कार नहर में गिरने से कई लोगों की मौत हुई। 

इसके अलावा अलग-अलग समय में नहर में डूबने और शव मिलने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इन घटनाओं का रिकॉर्ड यह बताने के लिए पर्याप्त है कि नहरों में गिरने का खतरा काल्पनिक नहीं है। इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि हादसों वाले और दुर्घटना संभावित स्थानों पर स्थायी रोकथाम के उपाय कितने किए गए हैं।
सड़क और नहर के बीच मजबूत क्रैश बैरियर या सुरक्षा दीवार वाहन को सीधे पानी में जाने से रोक सकती है। पुलिया और मोड़ वाले स्थानों पर पर्याप्त रोशनी, रिफ्लेक्टर और चेतावनी संकेत दुर्घटना की आशंका कम कर सकते हैं। 

जहां नहर गहरी है और बहाव तेज है, वहां लाइफ रिंग, रस्सी और प्राथमिक बचाव उपकरण भी लगाए जा सकते हैं। लेकिन राजधानी की सभी प्रमुख नहरों के संबंध में ऐसा कोई सार्वजनिक समेकित रिकॉर्ड सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो कि प्रत्येक जोखिम वाले स्थान का सुरक्षा ऑडिट कराया गया है और उसकी कमियों को दूर करने की समयबद्ध योजना लागू है।

सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदारी का है। नहर सुरक्षा की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग से जुड़ी है, जबकि सड़क, पुलिया, प्रकाश व्यवस्था और स्थानीय यातायात व्यवस्था में अलग-अलग एजेंसियों की भूमिका हो सकती है। हादसा होने पर पुलिस और आपदा राहत एजेंसियां सक्रिय होती हैं। यदि किसी नहर किनारे सड़क और पानी के बीच सुरक्षा इंतजाम कमजोर हैं, तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी किस विभाग की है और इसकी निगरानी कौन करता है? क्या प्रत्येक खतरनाक स्थान के लिए कोई नोडल अधिकारी तय है? यदि नहीं, तो दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने में भी वही समस्या सामने आ सकती है जो बचाव अभियान के दौरान दिखाई देती है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रेस्क्यू सिस्टम है। उत्तर प्रदेश में आपदा और जल संबंधी घटनाओं के लिए एसडीआरएफ का गठन किया गया है। बल में प्रशिक्षित गोताखोर और विशेष बचाव उपकरण उपलब्ध हैं। सरकार ने समय-समय पर इसकी क्षमता बढ़ाने और नई टीमों को संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। लेकिन किसी व्यक्ति के नहर में गिरने के बाद केवल एसडीआरएफ के पहुंचने का इंतजार करना पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो सकती।

शुरुआती समय में स्थानीय पुलिस, फायर सर्विस या प्रशिक्षित स्थानीय बचाव दल की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि विशेषज्ञ टीम के पहुंचने तक तलाश और प्राथमिक बचाव जारी रह सके। यही वजह है कि राजधानी की नहरों के लिए एक स्पष्ट रिस्पांस प्रोटोकॉल जरूरी है। सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस किसे सूचित करेगी, एसडीआरएफ को कितने समय में अलर्ट किया जाएगा, सबसे नजदीकी बचाव दल कौन सा होगा और घटनास्थल तक पहुंचने का निर्धारित समय कितना होगा-इन सभी सवालों के जवाब पहले से तय होने चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक संवेदनशील नहर क्षेत्र के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और वैकल्पिक रेस्क्यू प्वाइंट की सूची भी तैयार होनी चाहिए।

अब जरूरत केवल हादसे के बाद शव तलाशने की व्यवस्था मजबूत करने की नहीं, बल्कि हादसे को रोकने की है। लखनऊ की प्रमुख नहरों, पुलियों और नहर किनारे की सड़कों का संयुक्त सुरक्षा आॅडिट कराया जाना चाहिए। पुलिस, सिंचाई विभाग, नगर निगम, पीडब्ल्यूडी और आपदा प्रबंधन विभाग मिलकर ऐसे स्थान चिह्नित करें जहां वाहन या व्यक्ति के नहर में गिरने की आशंका अधिक है। प्रत्येक स्थान पर रेलिंग, क्रैश बैरियर, प्रकाश, चेतावनी बोर्ड और बचाव उपकरण की स्थिति दर्ज हो तथा कमी मिलने पर उसे दूर करने की समयसीमा तय की जाए।

केसरीखेड़ा की हालिया घटना ने एक बार फिर इस खतरे की तरफ ध्यान खींचा है, लेकिन मुद्दा किसी एक हादसे तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या लखनऊ की नहरों के किनारे अगला हादसा होने से पहले व्यवस्था जागेगी? हादसे के बाद रेस्क्यू करना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि जिन स्थानों पर हादसे की आशंका पहले से दिखाई दे रही है, वहां सुरक्षा इंतजाम पहले ही कर दिए जाएं। नहरें खामोश हैं, लेकिन उनके किनारे मौजूद खतरा लगातार बोल रहा है।

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