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ढोल-नगाड़ों के साथ बेटों और पोतों ने कराई बुजुर्ग माता-पिता की शादी मिसाल बना

बांसवाड़ा। अमूमन महानगरों और विदेशों में ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के किस्से आम बात हैं, लेकिन बांसवाड़ा के आदिवासी अंचल में एक जोड़ा वर्षों से बिना सामाजिक विवाह के साथ रह रहा था, उनको बुजुर्ग अवस्था में उनके ही बेटों और पोतों ने समाज के सामने पूरे विधि-विधान से उत्साह के साथ विवाह के बंधन में बांधा।

आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले के आनंदपुरी थाना क्षेत्र के सालिया गांव में एक ऐसा अनोखा और भावनात्मक विवाह समारोह संपन्न हुआ, जिसने आधुनिक समाज को पारिवारिक मूल्यों का एक बड़ा संदेश दिया है।

सालिया गांव के 60 वर्षीय रतना और 58 वर्षीय कड़वी देवी करीब 25 वर्ष पहले ‘नातरा प्रथा’ के तहत एक साथ रहने लगे थे। उस समय गंभीर आर्थिक तंगी के कारण उनका सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार पारंपरिक विवाह संस्कार नहीं हो सका था। वे वर्षों तक इसी तरह सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहे और इस दौरान उनके पोते-पोतियों तक की शादियां हो गईं। जब समय बदला और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया, तो उनके चारों बेटों ने मिलकर अपने माता-पिता को समाज में पूरा मान-सम्मान दिलाने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया।

चारों बेटों ने मिलकर आदिवासी समाज की परंपराओं के अनुसार विवाह संस्कार कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया।

इस अनूठी शादी की शुरुआत पारंपरिक हल्दी रस्म से हुई, जिसमें परिवार और समाज के प्रबुद्ध लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके बाद ढोल-कुंडी की थाप, मंगल गीतों और पारंपरिक लोकनृत्यों के बीच दूल्हा-दुल्हन बने इस बुजुर्ग दंपति ने समाज के सामने फेरे लिए।

इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और रिश्तेदार एकत्रित हुए। महिलाओं के पारंपरिक लोकगीतों और युवाओं के थिरकते कदमों ने पूरे गांव के माहौल को उत्सव में बदल दिया। आर्थिक 

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