वेनेजुएला के राष्ट्रपति रहे निकोलस मादुरो का अपहरण हो, ईरान पर हमला हो या फिर किसी भी दूसरे देश को धमकाना हो, डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में बेहद आक्रामक मूड में रहे हैं। अब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के पुराने ‘दुश्मन’ क्यूबा को धमकी देते हुए कहा है कि अगला नंबर उसी का है। क्यूबा भी अमेरिका से बातचीत करके समझौता करने की कोशिश कर रहा है ताकि बात बिगड़ने न पाए। क्यूबा में मचे बवाल के बीच ट्रंप की तरफ से बार-बार धमकी दी जा रही है और कई देश उसकी संप्रभुता को लेकर चिंता जता रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बावजूद क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कैनेल इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं और तनाव की स्थिति बनी हुई है।
हाल ही में स्पेन, ब्राजील और मेक्सिको ने एक साझा बयान जारी करते हुए कहा कि क्यूबा के लोग मानवीय त्रासदी से गुजर रहे हैं और इसे सुधारने के लिए तुरंत और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह चाहें तो क्यूबा के साथ कुछ भी कर सकते हैं। उनका यह भी कहना था कि उन्हें लगता है कि उन्हें क्यूबा पर कब्जा करने का सम्मान मिलेगा।
क्यूबा में क्या चल रहा है?
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के देशों के बीच में पड़ने वाला यह छोटा सा देश क्यूबा अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के पास पड़ता है। क्यूबा चारों तरफ से समुद्र से घिरा है इसलिए उसकी जमीनी सीमा किसी भी देश से नहीं लगती है। अमेरिका में लंबे समय से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा की सरकार है और इसी पार्टी के मिगुएल डियाज कैनेल साल 2018 से ही राष्ट्रपति हैं। एक बार याद दिलाने के लिए बता दें कि मशहूर नेता फिदेल कास्त्रो क्यूबा के ही राष्ट्रपति थे।
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मौजूदा मामला यह है कि अमेरिका पिछले कई महीनों से क्यूबा पर दबाव बना रहा है। जनवरी 2026 में डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा था, ‘कई साल तक वेनेजुएला से मिलने वाले तेल और पैसों पर क्यूबा पर निर्भर रहा। बदले में क्यूबा ने वेनेजुएला के पिछले दो तानाशाहों को सिक्योरिटी सर्विस दी लेकिन अब और नहीं चलेगा। क्यूबा को अब और तेल या पैसा नहीं दिया जाएगा। मेरा सुझाव है कि बहुत देर हो जाने से पहले क्यूबा एक समझौता कर ले।’
क्यूबा को अमेरिका ने किया बेहाल
अमेरिका की ओर से लादे गए कई प्रतिबंधों के चलते क्यूबा के लोग परेशान हैं। क्यूबा की तेल सप्लाई रोकने के बाद अमेरिका ने कई अन्य देशों को भी रोक दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि क्यूबा में तेल की सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई है। कई जगहों पर अब बिजली भी नहीं आ पा रही और देश की राजधानी हवाना तक के लोग अंधेरे में जी रहे हैं। बिजली की कमी के चलते अस्पतालों में सर्जरी तक टालनी पड़ रही है। तेल की कमी के चलते ट्रांसपोर्ट का काम ठप सा हो गया है और जरूरी चीजों की सप्लाई नहीं हो पा रही है।
दरअसल, क्यूबा में बिजली का उत्पादन भी तेल से ही होता है। इसी तेल और बिजली से पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम चलता है। अब तेल न मिलने से लगभग पूरा देश ही ठप हो गया है। अब पीने के पानी की सप्लाई करने वाले पंप और टैंकर तक नहीं चल पा रहे हैं। लोग खाना बनाने और पानी गर्म करने तक के लिए लकड़ी जला रहे हैं। राजधानी हवाना के लोग 15 घंटे तक बिना बिजली के ही जी रहे हैं।
कैसे खत्म होगा संकट?
अमेरिका चाहता है कि क्यूबा में पूरी तरह से राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर बदलाव हो जाए। क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी किसी भी हालत में सत्ता बरकरार रखना चाहती है और इसी लेकर बात अटकी हुई है। अमेरिका यह भी चाहता है कि समझौते के तहत क्यूबा यह भी स्वीकार करे कि उसके मौजूदा राष्ट्रपति अपना पद छोड़ देंगे। इस बात की भी धमकी दी जा रही है कि वेनेजुएला वाला हाल किया जाएगा।
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ट्रंप बार-बार धमकी भी दे रहे हैं कि अगर क्यूबा नहीं माना तो उनके पास कई विकल्प हैं। वह यह भी कह चुके हैं कि ईरान से निपटने के बाद अगला नंबर क्यूबा का ही है। अब क्यूबा का भी कहना है कि वह बातचीत कर रहा है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किन शर्तों पर बातचीत हो रही है।
क्या है अमेरिका और क्यूबा का झगड़ा?
दोनों देशों के रिश्तों का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। पहले क्यूबा पर स्पेन का कब्जा था लेकिन जब साल 1898 में अमेरिका ने स्पेन को हरा दिया तब स्पेन ने क्यूबा को अमेरिका को सौंप दिया। साल 1902 में क्यूबा आजाद हुआ लेकिन अमेरिका के ही संरक्षण मिला। क्यूबा के मामलों में अमेरिका का दखल भी रहा। होजे मिगुएल गोमेज की अगुवाई में विद्रोह हुआ तो अमेरिका ने फिर से क्यूबा पर कब्जा कर लिया।
अमेरिका की ही निगरानी में साल 1909 में चुनाव हुए और होजे मिगुएल गोमेज की सरकार बनी। 1912 में अश्वेत लोगों ने आंदोलन किया तो अमेरिकी सेना फिर से क्यूबा लौटी। 1953 में फिदे कास्त्रो ने विद्रोह की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुए।
असली दुश्मनी शुरू होती है साल 1959 से। तब क्यूबा में अमेरिका के समर्थन वाली सरकार थी और फिदेल कास्त्रो यानी कम्युनिस्ट नेता ने उस सरकार को हटा दिया। उस समय तो अमेरिका ने नई सरकार को मान्यता दे दी लेकिन जैसे-जैसे क्यूबा सोवियत संघ के नजदीक वैसे-वैसे अमेरिका चिढ़ता गया। इसी के बाद से अमेरिका ने क्यूबा को निशाने पर लिया और आर्थिक दंड देने लगा। जॉन एफ कैनेडी के समय अमेरिका ने क्यूबा को जरूरी सामान देने ही बंद कर दिए थे।
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1961 में अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो की सरकार हटाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। आगे चलकर जॉर्ज बुश और बिल क्लिंटन ने हेल्म्स बर्टन ऐक्ट बनाया। इसके तहत जब तक क्यूबा में लोकतंत्र नहीं आएगा और फिदेल कास्त्रो का परिवार सत्ता से बाहर नहीं आएगा तब तक क्यूबा पर लागू प्रतिबंध नहीं हटाए जाएंगे।
जब बराक ओबामा राष्ट्रपति बने तो क्यूबा को थोड़ी राहत मिली लेकिन जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप पहली बार सत्ता में आए उन्होंने ओबारा के ज्यादातर फैसले पलट दिए और क्यूबा को फिर से अलग-थलग कर दिया। 2019 में ट्रंप ने क्यूबा को आतंकवाद समर्थक देश गोषित कर दिया। जो बाइडन सत्ता में आए तो फिर से क्यूबा को थोड़ी राहत मिली लेकिन ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने से फिर उसकी हालत वही हो गई।












