देश में जनगणना हो, अपराध का डेटाबेस हो या परिवारों में कमाई, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े अन्य सर्वें हों, इन सबका मकसद नीति निर्माण से जुड़ा होता है। जनगणना में लोगों की गिनती के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति, उनके रहन-सहन और उनकी सुख-सुविधाएं देखी जाती हैं। सालाना रिकॉर्ड दर्ज करके अपराध, स्वास्थ्य और कई अन्य क्षेत्र में देश की स्थिति का आकलन होता है और इसी के हिसाब से नीतियां बनाई जाती हैं। हाल ही में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े सामने आए और इन पर खूब चर्चा भी हुई। हालांकि, डिजिटल युग में भी ये आंकड़े कम से कम दो साल पुराने हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी देरी से आ रहे आंकड़ों के हिसाब से नीति कैसे बनाई जा सकती है?
भारत में जनगणना आमतौर पर 10 साल के अंतराल पर होती है लेकिन आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी और मौजूदा समय में जनगणना हो रही है। कोरोना महामारी के कारण 5 साल की देरी से हो रही जनगणना के अंतिम आंकड़े सार्वजनिक आते-आते कम से कम 2027 बीत जाएगा। ऐसे में इस पर बनने वाली नीति भी कम से कम दो साल पुराने डेटा पर बन रही होगी। तेजी से बदलते भारत, बढ़ती जनसंख्या और डेमोग्राफी में हो रहे बदलाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जो नीति बनेगी वह किसी और संख्या के हिसाब से बनेगी और उस नीति के जमीन पर पहुंचते-पहुंचते संख्या काफी हद तक बदल चुकी होगी। आइए इस मामले को विस्तार से समझते हैं।
डेढ़ साल पुरानी NCRB रिपोर्ट
हाल ही में भारत में NCRB की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। इस रिपोर्ट में सभी राज्यों की पुलिस बताती हैं कि अपराध की कितनी घटनाएं हुईं, वे किस प्रकार की थीं, कितने मुकदमे दर्ज हुए, कितने लोगों को सजा हुई आदि। 2026 के मई महीने में आई इस रिपोर्ट में 1 जनवरी 2024 से 31 दिसंबर 2024 तक का डेटा लिया गया है। यानी भारत में अपराध के डेटा से जुड़ी सबसे ताजी रिपोर्ट भी डेढ़ साल पुराने डेटा पर आधारित है।
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इसकी तुलना पश्चिम के देशों से करें तो साल खत्म होने के अधिकतम 6 महीने में ये देश अपराध से जुड़ा डेटा सार्वजनिक कर देते हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2026 में इंग्लैंड और वेल्स में अपराध के डेटा पर आधारित जो रिपोर्ट सार्वजनिक की गई उसमें 31 दिसंबर 2025 तक के आंकड़े शामिल किए गए। अमेरिका में यही डेटा रियल टाइम में उपलब्ध है और इसे फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) की वेबसाइट पर किसी भी समय देखा जा सकता है। 2 जून को इस खबर के लिए रिसर्च करते समय हमने FBI की वेबसाइट खोली तो 15 मई तक का डेटा उपलब्ध था।
NCRB की यह रिपोर्ट थानों, जिलों और राज्यों से मिलने वाले डेटा के हिसाब से तैयार की जाती है। अब जब इंटरनेट का जमाना है और लगभग हर पुलिस स्टेशन इंटरनेट की सुविधा से लैस है और कई राज्यों में ऑनलाइन एफआईआर तक की सुविधा उपलब्ध है तब डेटा आने में इतनी देरी सवालिया निशान खड़े करती है।
बासी हो चुका नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे
भारत का स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय समय-समय पर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करता है। अभी तक इस तरह के कुल 6 सर्वे किए गए हैं और आखिरी सर्वे की रिपोर्ट भी मई 2026 में ही सार्वजनिक की गई है। यह रिपोर्ट इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज तैयार करता है। इस नई रिपोर्ट में डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर (DBT), सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) कवरेज, डिजिटल साक्षरता और वित्तीय लेनदेन जैसी चीजें भी जोड़ी गईं। इस सर्वे के लिए दो चरण में डेटा इकट्ठा किया गया।
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पहला चरण 28 मई 2023 से 26 फरवरी 2024 और दूसरा 7 फरवरी 2024 से 31 दिसंबर 2024 तक चला। इसमें 6.79 लाख परिवारों को कवर किया गया। अब अगर सर्वे की टाइमिंग और इसका डेटा सार्वजनिक करने के समय को देखें तो इसमें भी कम से कम डेढ़ साल का अंतर है।

इस सर्वे में उम्र वर्ग के हिसाब से जनसंख्या, लोगों के घरों में बिजली-पानी के कनेक्शन, आयोडीन युक्त नमक की उपलब्धता, हेल्थ इंश्योरेंस, शिक्षा, शादी, प्रजनन, परिवार नियोजन आदि का डेटा इकट्ठा किया जाता है। इसमें से ज्यादातर फैक्टर ऐसे हैं जो डेढ़ साल के अंतर में काफी हद तक बदल सकते हैं और उनकी सही टारगेटिंग में समस्या आ सकती है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे औम तौर पर 2-3 साल के अंतर पर ही होता है लेकिन यह अंतर कई बार अनियमित रहा है। साल 1992-93 में पहली बार यह सर्वे कराया गया था और अब तक यानी पिछले 34 साल में यह सर्वे सिर्फ 6 बार हुआ है। उसमें भी तीसरे और चौथे सर्वे के बीच 10 साल का अंतर था। पांचवां सर्वे 2019-21 के बीच हुआ और छठा सर्वे 2023-24 के बीच हुआ जिसकी रिपोर्ट 2026 में आई है। यह दिखाता है कि इन सर्वे को लेकर हमारी सरकारें और संस्थाएं बेहद कम गंभीर हैं और संभवत: नीति निर्धारण में भी इनकी अहमियत नहीं समझी जाती।

जनगणना में देरी
अगर दुनिया के 10 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों को देखें तो ज्यादातर देशों में जनगणना 10 साल के अंतर पर ही होती है। हालांकि, जापान और कनाडा में 5 साल तो फ्रांस में हर साल जनगणना कराई जाती है। भारत में जनगणना का अंतराल 10 साल का है। आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी और तमाम नीतियां आज भी इसी के आधार पर बन रही हैं। अगली जनगणना 2021 में होनी थी लेकिन कोरोना और कई अन्य कारणों से जनगणना में 5 साल से ज्यादा की देरी हो चुकी है।
आरक्षण, सामाजिक सुरक्षा और कई अन्य योजनाएं आज भी 2011 के डेटा पर ही निर्धारित हो रही हैं। इसके चलते कई बार सवाल इसकी प्रासंगिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। मौजूदा समय में जो जनगणना चल रही है और उसके आंकड़े आने में भी 2027 का साल बीत जाने की उम्मीद है, ऐसे में कोई भी नीति इसके बाद ही बन सकती है। तब तक सभी नीतियां 2011 के डेटा के आधार पर ही बनती रहेंगी।
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आखिरी पशुगणना के आंकड़े साल 2024 में आए थे। इसी तरह मार्च 2026 में आई पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) रिपोर्ट में जनवरी 2025 से दिसंबर 2025 तक का डेटा इकट्ठा किया गया और यह रिपोर्ट लगभग सवा साल के बाद सामने आई है। इस रिपोर्ट में पता चलता है कि कितने लोग रोजगार से जुड़े हैं, वे किस तरह के काम करते हैं, उनको कैसे पैसे मिलते हैं और बेरोजगारी किस तरह की और कितनी है। ऐसी जरूरी रिपोर्ट में भी एक साल की देरी से नीति निर्धारण में समस्या हो सकती है। अगर इस डेटा का अध्ययन करके कोई नीति बनाई जाए तो उसे लागू करने में भी कम से कम एक साल और का समय लग जाएगा।

खेती वाली रिपोर्ट भी लेट
देश के कृषि मंत्रालय की ओर से जारी होने वाली सालाना रिपोर्ट एक साल देरी से चलती है। मई 2026 में जारी की गई रिपोर्ट का नाम ‘वार्षिक रिपोर्ट 2025-26’ था। हालांकि, इस रिपोर्ट में ज्यादातर आंकड़े वित्त वर्ष 2024-25 के थे। उदाहरण के लिए तिलहन और दलहन फसलों के उत्पादन का डेटा 31 दिसंबर 2025 तक का शामिल किया गया। कहीं-कहीं पर फरवरी 2026 के आंकड़े भी शामिल किए गए। हालांकि, इस तरह के ज्यादातर आंकड़े अनुमान पर आधारित थे।
समय पर भी आ रही हैं कुछ रिपोर्ट
देश के स्कूलों की स्थिति बताने वाली यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉरर एजुकेशन प्लस यानी UDISE+ रिपोर्ट इस मामले में समय से आ जाती है 2024-25 के शैक्षणिक सत्र की रिपोर्ट अगस्त 2025 में जारी कर दी गई थी। यह रिपोर्ट स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं, शिक्षकों की संख्या और अन्य चीजों पर प्रकाश डालती है। समय पर आने वाली इन रिपोर्ट से तुरंत नीतिगत बदलाव करने और सही समय पर फैसले लेने में मदद मिलती है।
रिपोर्ट में देरी और उसका असर
अगर जनगणना की बात करें तो देश में खाद्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और अन्य लाभकारी योजनाएं इसी के डेटा के हिसाब से निर्धारित होती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, महिलाओं और संवेदनशील वर्ग पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, मौजूदा समय में जो राशन बांटा जाता है वह 2011 की जनगणना के आधार पर बांटा जाता है। इसके चलते कई लोग राशन से दूर रह जाते हैं। इसी तरह अन्य संसाधनों के बंटवारे में भी समस्या होती है।
कई अन्य सर्वे में जनगणना के डेटा को ही आधार लिया जाता है। ऐसे में अन्य सर्वे भी जनगणना में देरी के चलते प्रभावित होते हैं। परिवारों की सेहत की जानकारी देने वाला नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे हो या फिर लोगों के खर्च की जानकारी देने वाला कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे हो, इन सब में 2011 की जनगणना के डेटा का ही इस्तेमाल हो रहा है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में भी इसी के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है।
आरक्षण का निर्धारण भी जनगणना के आधार पर ही होता है। इसके अलावा सर्वे और अन्य रिपोर्ट में देरी का असर यह होता है कि जो डेटा आता भी है वह सटीक नहीं होता है। भारत की जनसंख्या और डेमोग्राफी में तेजी से होते बदलाव के समय में इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर और भी सवाल खड़े होते हैं।
आरक्षण पर असर
मौजूदा समय में जो जनगणना हो रही है उसमें लोगों की जातिगत जनगणना की बात भी कही जा रही है। इसमें होने वाली देरी के चलते यह पता नहीं चल पाता है कि किन जातियों के लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति खराब है। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए भी सही मैपिंग हो पाती है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी इसी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर तय होता है, ऐसे में लंबे समय से आंकड़े ही ना आ पाने का नुकसान होता है।
पुराने डेटा के आधार पर अनुमान लगाकर योजनाएं बनाई जाती हैं जिनमें गलती की आशंका होती है। साथ ही, डेमोग्राफी में बदलाव, बदलती तकनीक और जनसंख्या के बदलते पैटर्न से भी लाभार्थी वर्ग की सही मैपिंग नहीं हो पाती है। साथ ही, इस बात की पूरी आशंका होती है कि तय होने वाली नीति भी गलत दिशा में चली जाए।
अगर पश्चिमी देशों से तुलना करें तो भारत की आबादी काफी ज्यादा है, स्वास्थ्य, इकॉनमी और अन्य सामाजिक खतरों के प्रति भारत की जनता ज्यादा संवेदनशील है। इसके बावजूद पश्चिमी देशों में ऐसे सर्वे, जनगणना और आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया सतत चलती रहती है और ज्यादातर सर्वे सालाना आते हैं। वहीं, भारत में देखा जाए तो जनगणना जैसा बेहद अनिवार्य काम सामान्य तौर पर ही 10 साल पर होता है और अब तो इसमें पांच साल और की देरी हो चुकी है।













