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बस्ती के बहादुरपुर ब्लॉक में मनोरमा नदी तट पर शुक्रवार को ‘महुआ डाबर जनसंहार स्मृति दिवस’ मनाया गया। इस दौरान 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जान गंवाने वाले ज्ञात-अज्ञात शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने महुआ डाबर जनसंहार को इतिहास में उचित स्थान दिलाने और शहीदों के सम्मान में राष्ट्रीय स्तर पर पहल किए जाने की मांग उठाई। महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने 3 जुलाई 1857 की घटना को याद किया। कार्यक्रम में बताया गया कि इतिहासकारों के अनुसार ब्रिटिश सेना ने उस दिन महुआ डाबर गांव को तीन ओर से घेर लिया था। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीणों की जान गई और बाद में गांव को आग के हवाले कर दिया गया। बताया गया कि इसके बाद गांव का नाम राजस्व अभिलेखों से भी हटा दिया गया था। महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक एवं शहीद जफर अली के वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि महुआ डाबर की घटना को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका है। उन्होंने इस घटना को पाठ्यक्रम में शामिल करने और व्यापक स्तर पर शोध एवं संरक्षण की आवश्यकता बताई। उन्होंने भारत सरकार से 3 जुलाई को ‘महुआ डाबर बलिदान दिवस’ के रूप में घोषित करने, शहीद स्मारक एवं संग्रहालय परिसर विकसित करने तथा इसे पर्यटन मानचित्र से जोड़ने का सुझाव दिया। साथ ही यूपी बोर्ड और एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तकों में महुआ डाबर जनसंहार का उल्लेख शामिल किए जाने की मांग भी रखी। डॉ. राना ने 1857 के शहीद परिवारों के सम्मान और पुनर्वास के लिए विशेष पहल करने तथा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित शोध को बढ़ावा देने की भी बात कही। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके बलिदान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
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महुआ डाबर जनसंहार को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की उठी मांग:बस्ती के बहादुरपुर में 1857 के शहीदों को दी श्रद्धांजलि
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