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डिजिटल पेमेंट में सुधार, ई-मैंडेट सिस्टम हुआ मजबूत,हर ट्रांजैक्शन से पहले अलर्ट अनिवार्य

  • 15 हजार रुपए तक ऑटो डेबिट पर ओटीपी से राहत
  • बीमा, एसआईपी, कार्ड बिल में 1 लाख तक छूट

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से ई-मैंडेट (ऑटो-डेबिट) ढांचे को अपडेट करते हुए एक समेकित फ्रेमवर्क जारी किया है। 21 अप्रैल 2026 को जारी यह ढांचा पूरी तरह नया नियम नहीं, बल्कि पहले से लागू प्रावधानों को एक जगह समेटने और कुछ अहम सुधार जोड़ने की दिशा में उठाया गया कदम है। इसका सीधा असर देशभर के उन करोड़ों बैंक ग्राहकों पर पड़ेगा, जिनके खातों से हर महीने नियमित भुगतान स्वत: कटते हैं।

नए फ्रेमवर्क के तहत सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि अब 15,000 रुपए तक के रिकरिंग आॅटो-डेबिट भुगतान के लिए हर बार ओटीपी की आवश्यकता नहीं होगी। इससे मोबाइल बिल, बिजली बिल, डीटीएच, ओटीटी सब्सक्रिप्शन जैसे छोटे-मोटे नियमित खर्चों के भुगतान में आने वाली तकनीकी अड़चनें कम होंगी और असफल ट्रांजैक्शन की समस्या घटेगी।

हालांकि, पहली बार ई-मैंडेट रजिस्ट्रेशन और शुरूआती ट्रांजैक्शन के दौरान ग्राहक प्रमाणीकरण अनिवार्य रहेगा।इसी के साथ कुछ विशेष श्रेणियों-जैसे बीमा प्रीमियम, म्यूचुअल फंड एसआईपी और क्रेडिट कार्ड बिल भुगतान के लिए सीमा को बढ़ाकर 1 लाख तक कर दिया गया है, जहां निर्धारित शर्तों के तहत बार-बार ओटीपी की जरूरत नहीं होगी। यह सुविधा विशेष रूप से उन ग्राहकों के लिए राहत लेकर आई है, जिनके नियमित भुगतान अपेक्षाकृत अधिक राशि के होते हैं।

ग्राहकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्री-डेबिट नोटिफिकेशन की व्यवस्था को यथावत रखते हुए और सख्ती से लागू किया गया है। अब हर ऑटो-डेबिट से कम से कम 24 घंटे पहले ग्राहकों को एसएमएस या ई-मेल के माध्यम से सूचना देना अनिवार्य है। इस अलर्ट में भुगतान की राशि, लाभार्थी और कटौती की तारीख स्पष्ट रूप से बताई जाएगी, ताकि ग्राहक समय रहते निर्णय ले सकें या किसी अनचाहे भुगतान को रोक सकें।फ्रेमवर्क का एक महत्वपूर्ण पहलू ग्राहकों को अधिक नियंत्रण देना भी है। अब उपभोक्ता अपने ई-मैंडेट को कभी भी संशोधित, अस्थायी रूप से रोक या पूरी तरह रद्द कर सकते हैं। पहले जहां कई मामलों में अनचाहे सब्सक्रिप्शन बंद कराना जटिल प्रक्रिया होती थी, वहीं अब इसे सरल और पारदर्शी बनाया गया है।

साथ ही, इस सुविधा के लिए किसी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। डिजिटल लेनदेन के बढ़ते दायरे को देखते हुए नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संचालित प्लेटफॉर्म विशेषकर यूपीआई के व्यापक उपयोग ने ऐसे मजबूत और भरोसेमंद ऑटो-डेबिट सिस्टम की आवश्यकता को और बढ़ा दिया था। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक ने यह कदम उठाया है।कुल मिलाकर यह पहल किसी बड़े बदलाव के बजाय एक संरचनात्मक सुधार है, जिससे मौजूदा प्रणाली को अधिक स्पष्ट, उपयोगकर्ता-अनुकूल और सुरक्षित बनाया गया है।

हालांकि, इसके साथ ही ग्राहकों को सतर्क रहने की भी सलाह दी गई है। उन्हें अपने सक्रिय ई-मैंडेट की नियमित समीक्षा करनी चाहिए और प्री-डेबिट अलर्ट पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि किसी भी अनधिकृत लेनदेन से बचा जा सके। आरबीआई का यह अपडेट डिजिटल भुगतान प्रणाली को अधिक भरोसेमंद बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करता है।

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