लखनऊ। बृहस्पतिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस के गहन आध्यात्मिक उपदेश जिन्हें उन्होंने 22 अक्टूबर 1885 को अपने भक्तों के समक्ष प्रस्तुत किया था, इन उपदेशों का मुख्य संदेश है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है, यदि वह सही मार्ग और साधना अपनाए।
स्वामी जी ने बताया कि रामकृष्ण ने ‘निर्जन वास’ या एकांत की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि मन को शुद्ध और एकाग्र बनाने के लिए व्यक्ति को कुछ समय संसार की भीड़-भाड़ से दूर रहकर आत्मचिंतन करना चाहिए। यह अवधि एक महीने से लेकर एक वर्ष तक हो सकती है। इस एकांत में व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और ईश्वर से जुड़ने का प्रयास करता है। एकांतवास के दौरान उन्होंने चार महत्वपूर्ण अभ्यास बताए।
पहला है स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण ने इन शिक्षाओं को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने दूध और दही का उदाहरण दिया। जैसे दूध को यदि पानी में मिला दिया जाए तो वह घुल जाता है, वैसे ही सामान्य मन संसार में खो जाता है। लेकिन यदि उसी दूध को दही बनाकर मथा जाए, तो उसमें से मक्खन निकलता है, जो पानी में भी नहीं घुलता।
इसी प्रकार, जब मन को साधना और ईश्वर-चिंतन के माध्यम से परिपक्व बनाया जाता है, तो वह संसार में रहते हुए भी उससे प्रभावित नहीं होता। कटहल के उदाहरण से समझाते हुए स्वामी ने कहा कि जैसे हाथों में तेल लगाने से कटहल का चिपचिपापन नहीं लगता, वैसे ही यदि मन को पहले ईश्वर-भक्ति से मजबूत बना लिया जाए, तो संसार की आसक्तियां व्यक्ति को प्रभावित नहीं कर पातीं।












