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नगर पंचायत नगर बाजार स्थित मदरसे के प्रांगण में मुहर्रम की दसवीं तारीख को एक मजलिस का आयोजन किया गया। देर शाम शुरू हुआ यह कार्यक्रम रात 10 बजे संपन्न हुआ। इस अवसर पर मौलाना मुनव्वर ने कर्बला की घटना और उसके ऐतिहासिक परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कर्बला केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और इंसाफ के लिए दी गई एक महान कुर्बानी का प्रतीक है। मौलाना मुनव्वर ने बताया कि 10 मुहर्रम 61 हिजरी (680 ईस्वी) को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों को कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया गया था। इस घटना के बाद यज़ीद बिन मुआविया की सत्ता को लगातार विरोध, असंतोष और विद्रोहों का सामना करना पड़ा। उन्होंने मदीना में हुए वाकया-ए-हर्रा और मक्का में हुए संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि इन घटनाओं ने उमय्यद शासन की नींव को कमजोर कर दिया था। मौलाना मुनव्वर ने जोर देकर कहा कि इतिहास गवाह है कि कर्बला में अत्याचार का समर्थन करने वाले अनेक लोगों को बाद में राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इमाम हुसैन की शहादत ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि अन्याय और जुल्म के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। मौलाना मुनव्वर ने बताया कि यज़ीद का शासनकाल अधिक समय तक नहीं चला और 683 ईस्वी में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उमय्यद शासन लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता और विरोध आंदोलनों से जूझता रहा। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि कर्बला का संदेश आज भी मानवता को सत्य, न्याय, धैर्य और सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्रेरित करता है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर कारी नूर आलम, हाफिज़ गुलाम सरवर, हसन अली, शमशुल हुदा, इकबाल अहमद, फरीद खान नूरानी, कमरउलहुदा, शाबान इदरीशी, नियाज इदरीशी, मुनौव्वर हुसैन, डॉक्टर फारूक, मो० वारिस, मो० आरिफ, जमील अहमद, फिरोज अहमद और कलीमुल्लाह अंसारी सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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मौलाना मुनव्वर ने बताया कर्बला के बाद यज़ीदियों का अंजाम:इतिहास में दर्ज हैं सत्य और न्याय के लिए संघर्ष के सबक
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