डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के हटवा सादात ग्राम स्थित इमाम बारगाह जांबाज़ हुसैन में शनिवार को मोहर्रम की ग्यारह तारीख के अवसर पर मर्सिया मजलिस का आयोजन किया गया। इस मजलिस को गाजीपुर से आए मौलाना उरूज अली ने संबोधित किया। मजलिस का आगाज़ शायरों द्वारा कलाम पेश करने से हुआ। इसमें नायाब हल्लौरी, सावन हल्लौरी, अम्मार हल्लौरी, आले रज़ा हल्लौरी, मौलाना जव्वार, खुलुस अंसार और जमाल जैसे शायरों ने जनाब ज़ैनब की शान में कलाम प्रस्तुत किए। इसके बाद अम्बर मेहदी और उनके हमनवा ने मर्सियाख्वानी की। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना उरूज अली ने कहा कि कर्बला दुनिया को हक, सच्चाई और इंसाफ का पैगाम देता है। उन्होंने बताया कि हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में नाना के दीन को बचाने के लिए जो महान कुर्बानियां दीं, उससे पूरी दुनिया को यह संदेश मिलता है कि कभी भी जालिम के आगे सिर नहीं झुकाना चाहिए। मौलाना ने आगे कहा कि इमाम हुसैन और उनके इकहत्तर साथियों ने कर्बला में भूखे-प्यासे रहकर शहादत देकर यह साबित कर दिया कि सच्चाई को कोई झुका नहीं सकता। उन्होंने हदीस के हवाले से बताया कि शिया और सुन्नी के बाप एक हैं; शिया अली से मोहब्बत करता है और सुन्नी रसूल की सुन्नत पर अमल करता है। मौलाना उरूज अली ने जोर दिया कि शिया शिया बनकर जिएं और सुन्नी सुन्नी बनकर जिएं। उन्होंने कुछ लोगों की मंशा पर चिंता व्यक्त की जो शिया-सुन्नी को कभी मिलने नहीं देना चाहते। उन्होंने यह भी कहा कि जो फातिमा के अदब में खड़ा न हो, वह रसूल को नहीं मानता, क्योंकि रसूल स्वयं फातिमा के सम्मान में खड़े हो जाते थे। मजलिस के आखिर में मौलाना ने कर्बला की भीषण गर्मी का जिक्र किया, जहां हुसैन का बे-गोर-ओ-कफन लाश रेती पर पड़ा रहा, जबकि आज इतनी गर्मी में कोई नंगे पैर नहीं चल सकता। अंत में, मजलिस के आयोजक सरफ़राज़ रिज़्वी ने उपस्थित अकीदतमंदों का आभार व्यक्त किया।
हटवा सादात में मोहर्रम की ग्यारह तारीख पर मर्सिया मजलिस:मौलाना उरूज अली ने कर्बला के संदेश पर प्रकाश डाला
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