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दिल्ली की टूट से पंजाब में सियासी हलचल,विपक्ष का ‘नेतृत्व संकट’ नैरेटिव तेज 


सात राज्यसभा सांसदों के जाने से पंजाब इकाई पर सीधा असर
2027 से पहले सियासी जमीन खिसकने के संकेत

नई दिल्ली। दिल्ली में 24 अप्रैल को शुरू हुआ सियासी घटनाक्रम अब पंजाब की राजनीति में गहरे असर के साथ सामने आ रहा है। राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों का भारतीय जनता पार्टी में जाने का फैसला केवल दल-बदल नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और नेतृत्व संकट को खुलकर उजागर कर दिया है। 
सोमवार को राज्यसभा में इस घटनाक्रम को औपचारिक रूप तब मिला, जब सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने सातों बागी सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी। इसके बाद उच्च सदन में भाजपा की संख्या बढ़कर 113 हो गई, जबकि आप की ताकत घटकर महज तीन सांसदों तक सिमट गई। यह बदलाव सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पंजाब की राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है।
पंजाब, जहां आप अब तक अपने सबसे मजबूत गढ़ के रूप में देखी जाती रही है, वहां इस घटनाक्रम ने राजनीतिक अस्थिरता की आशंका को जन्म दिया है। बागी सांसदों में अधिकांश का संबंध पंजाब से होना स्थिति को और संवेदनशील बना देता है। ऐसे में मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है, सरकार की स्थिरता बनाए रखना और पार्टी संगठन को टूटने से बचाना। 
राजनीतिक गलियारों में इस पूरे प्रकरण को ‘संगठन बनाम सरकार’ की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाने वाले राघव चड्ढा और भगवंत मान के बीच मतभेदों की चर्चा रही है, लेकिन अब यह टकराव खुलकर सामने आ गया है। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। 
भाजपा ने इस मौके को रणनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश शुरू कर दी है। हरभजन सिंह, अशोक मित्तल और विक्रमजीत सिंह साहनी जैसे प्रभावशाली चेहरों का साथ मिलने से पार्टी को पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिला है। लंबे समय से राज्य में सीमित प्रभाव रखने वाली भाजपा अब इसे ‘मिशन पंजाब’ की शुरूआत के रूप में देख रही है।
वहीं कांग्रेस भी इस घटनाक्रम को आप की संगठनात्मक कमजोरी के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि सत्ता में होने के बावजूद अअढ अपने नेताओं को साथ रखने में नाकाम रही है। ऐसे में राज्य की राजनीति अब त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ती दिख रही है, जहां हर दल अपने-अपने नैरेटिव को मजबूत करने में जुटा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम एक ‘चेन रिएक्शन’ की शुरूआत भी हो सकता है। यदि समय रहते आप हालात को संभाल नहीं पाती है, तो इसका असर अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सरकार पर कोई तत्काल खतरा नहीं दिखता, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का असर निर्णय प्रक्रिया और जनधारणा पर पड़ना तय माना जा रहा है। कुल मिलाकर, दिल्ली की यह टूट अब पंजाब में सियासी भूचाल का रूप ले चुकी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि आप इस संकट को अवसर में बदल पाती है या विपक्ष इसे अपने लिए निर्णायक बढ़त में तब्दील कर देता है।

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