- जीवन के अंतिम दौर में एनडी तिवारी ने उज्ज्वला शर्मा से की शादी
- रोहित शेखर को बेटे का दर्जा, अखिलेश सरकार में मिला अहम दायित्व
- मुलायम सिंह यादव ने साधना गुप्ता को पत्नी और प्रतीक को परिवार का नाम दिया
- प्रतीक यादव राजनीति से दूर रहे, अपर्णा यादव बाद में भाजपा में शामिल हुईं
- रोहित शेखर का पारिवारिक जीवन विवादों में रहा, कम उम्र में हुई मौत
- प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पर साझा की थी पीड़ा, फिर अचानक निधन
लखनऊ। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बड़े राजनीतिक चेहरों का निजी जीवन भी अक्सर चर्चा और जिज्ञासा का विषय बन जाता है। समय बीतने के साथ उनसे जुड़े कई ऐसे पहलू सामने आते हैं, जो उनकी राजनीतिक छवि से अलग एक व्यक्तिगत कहानी बयान करते हैं। उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों पंडित नारायण दत्त तिवारी (एनडी) और दूसरे थे मुलायम सिंह यादव (नेता जी) के जीवन से जुड़ी कुछ परिस्थितियां भी वर्षों तक चर्चा में रहीं।
दोनों नेताओं के राजनीतिक जीवन, विचारधारा और परिस्थितियां भले अलग रहीं, लेकिन निजी जीवन के कुछ पहलुओं में समानता दिखाई देती है। एनडी तिवारी ने जीवन के अंतिम दौर में उज्ज्वला शर्मा से विवाह किया और लंबे विवाद के बाद रोहित शेखर तिवारी को अपना पुत्र स्वीकार किया। बाद में रोहित शेखर को अखिलेश यादव सरकार में परिवहन विभाग का सलाहकार बनाया गया, जिसे राज्य मंत्री स्तर का दर्जा प्राप्त था।
इसी तरह मुलायम सिंह यादव ने भी साधना गुप्ता के साथ अपने संबंधों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया और उनके पुत्र प्रतीक यादव को परिवार की पहचान मिली। हालांकि प्रतीक यादव ने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी और व्यावसायिक जीवन को प्राथमिकता दी। दूसरी ओर उनकी पत्नी अपर्णा राजनीति में सक्रिय रहीं और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक सफर अलग-अलग रहे, लेकिन निजी जीवन से जुड़ी परिस्थितियों और बाद की घटनाओं में कुछ समानताएं देखने को मिलती हैं। रोहित शेखर का निजी जीवन लगातार विवादों और पारिवारिक तनावों के कारण सुर्खियों में रहा तथा कम उम्र में उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। वहीं प्रतीक यादव ने भी समय-समय पर सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं। बाद में परिस्थितियां सामान्य होती दिखीं, लेकिन फिर उनके निधन की खबर ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों को चौंका दिया।
एक परिवार के रहते दूसरे को अपनाना पड़ता है भारी…!

इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र द्विवेदी का मत रहा कि चाहे कोई राजनेता हो, अफसर हो या फिर कोई और प्रतिनिधि सार्वजनिक जनजीवन में एक भरे पुरे परिवार के रहते हुए किसी दूसरे परिवार को अपनाना कहीं न कहीं सामाजिक व नैतिक नजरिये से सही नहीं माना जा सकता, यदि कुछ परिस्स्थितियोंवश ऐसा कुछ हो जाता है तो फिर अधिकांशत: इनके दूसरे जीवन का परिणाम कुछ इसी तरह निकलकर आता है जिसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है।












