बहराइच मेडिकल कॉलेज का मदर मिल्क बैंक कई नवजातों के लिए जीवनरक्षक साबित हो रहा है। यहां दान किए गए मां के दूध से शिशुओं को आवश्यक पोषण और संक्रमण से सुरक्षा मिल रही है। पिछले एक महीने में 780 जरूरतमंद नवजातों को डोनर मिल्क उपलब्ध कराया गया है। साल 2022 में शुरू हुए इस मिल्क बैंक को शुरुआती दौर में सामाजिक भ्रांतियों और दूसरी मां का दूध पिलाने को लेकर झिझक का सामना करना पड़ा था। हालांकि, डॉक्टरों और काउंसलर्स द्वारा लगातार चलाए गए जागरूकता अभियानों से लोगों का भरोसा बढ़ा। हर महीने औसतन 57 माताएं प्रसव के बाद होने वाले दर्द और कमजोरी के बावजूद स्वेच्छा से दूध दान कर रही हैं। दूध दान करने वाली एक मां ने बताया कि शुरुआत में उन्हें अपने बच्चे के लिए दूध कम पड़ने का डर था, लेकिन डॉक्टरों ने समझाया कि दूध निकालने से आपूर्ति कम नहीं होती। उनका यह दान किसी दूसरे बच्चे की जान बचा सकता है, जिससे यह फैसला आसान हो गया। एसएनसीयू इंचार्ज डॉ. असद अली के अनुसार, नवजात मृत्यु के प्रमुख कारणों में संक्रमण, निमोनिया और मेनिनजाइटिस शामिल हैं। कम वजन और समय से पहले जन्मे शिशुओं में इनका खतरा अधिक होता है। मां का दूध ऐसे बच्चों के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है। डॉ. अली ने बताया कि लगभग 15 से 40 प्रतिशत नवजात विभिन्न कारणों से शुरुआत में अपनी मां का दूध नहीं पा पाते हैं। ऐसे में मदर मिल्क बैंक उनके लिए जीवनरक्षक सिद्ध होता है, जो उन्हें आवश्यक पोषण और सुरक्षा प्रदान करता है। इनको होती है डोनर मिल्क की जरूरत
मां की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति, संक्रमण, प्री-एक्लेम्पसिया या आईसीयू में भर्ती होने के कारण नवजात को तुरंत स्तनपान नहीं मिल पाता। वहीं समय से पहले जन्मे, कम वजन वाले या कटे होंठ एवं तालु जैसी समस्याओं वाले शिशु भी सीधे स्तनपान नहीं कर पाते। ऐसे मामलों में डोनर मिल्क उनके लिए सुरक्षित और जरूरी पोषण का सहारा बनता है।
डिब्बाबंद दूध पर खत्म हो रही निर्भरता
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. संजय खत्री के अनुसार, मिल्क बैंक शुरू होने के बाद अस्पताल में डिब्बाबंद दूध पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई है, जिससे गरीब परिवारों को आर्थिक राहत भी मिली है।
तकनीक से रखी जाती है निगरानी
दूध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डोनर माताओं की स्वास्थ्य जांच, सुरक्षित संग्रहण और मोबाइल ऐप और क्यूआर कोड आधारित निगरानी जैसी सख्त व्यवस्थाएं अपनाई जाती हैं। डॉ. असद अली कहते हैं- जब गंभीर स्थिति में भर्ती नवजात स्वस्थ होकर घर लौटते हैं, वही हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि और संतोष होता है।












