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पाकिस्तान में फ्यूल की कमी का असर, सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में होगी कटौती

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शनिवार को एक बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने सरकारी कंपनियों (स्टेट-ओन्ड एंटरप्राइजेज) और सरकारी संरक्षण वाली स्वायत्त संस्थाओं के कर्मचारियों की सैलरी में 5 से 30 प्रतिशत तक कटौती को मंजूरी दे दी है। यह फैसला देश में चल रहे ईंधन संकट और आर्थिक मुश्किलों से निपटने के लिए लिया गया है।

यह बैठक प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई, जहां पहले घोषित बचत और खर्चों को कम करने के उपायों की समीक्षा की गई। मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष के कारण ईंधन की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। पाकिस्तान में पिछले हफ्ते पेट्रोल की कीमत में 55 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है।

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सैलरी में होगी कटौती

प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान के अनुसार, बैठक में तय किया गया कि सरकारी कर्मचारियों की तरह अब सरकारी कंपनियों और संस्थाओं के कर्मचारियों की सैलरी में भी 5 से 30 फीसदी कटौती होगी। यह बचत की गई रकम जनकल्याण के कामों में लगाई जाएगी।

अन्य महत्वपूर्ण फैसले-

  • सरकारी गाड़ियों के लिए ईंधन की मात्रा में 50 प्रतिशत कटौती अगले दो महीनों के लिए जारी रहेगी।

  • सरकारी विभागों की 60 प्रतिशत गाड़ियां अगले दो महीनों में सड़कों से हटा दी जाएंगी।

  • सरकारी कंपनियों के बोर्ड में सरकारी प्रतिनिधियों को अब कोई मीटिंग फीस नहीं मिलेगी। यह भी बचत में जुड़ेगा।

  • नई गाड़ियां खरीदने पर पूरी तरह रोक है।

  • सरकारी खरीद पर भी रोक लगाई गई है।

  • कैबिनेट सदस्यों, मंत्रियों, सलाहकारों और विशेष सहायकों की अगले दो महीनों की सैलरी जनकल्याण के लिए बचत के रूप में इस्तेमाल होगी।

  • सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों और अन्य की विदेश यात्राओं पर पूरी रोक बनी रहेगी।

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पहले से उठाया कदम

सरकार पहले से ही कई कदम उठा चुकी है, जैसे सरकारी दफ्तरों में चार दिन का वर्किंग वीक, आधे कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम और स्कूलों की छुट्टियां। ये सब उपाय ईंधन की बचत और खर्च कम करने के लिए हैं।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि यह मुश्किल वक्त है लेकिन सबको मिलकर देश की मदद करनी होगी। बचत की रकम गरीबों और आम लोगों की भलाई में लगेगी।

ईरान युद्ध से भारत क्या सीख सकता, सस्ते ड्रोन से निपटने का इलाज क्या है?

दुनिया सैन्य तौर पर ईरान को बहुत एडवांस नहीं मानती थी। मगर 15 दिन के युद्ध ने यह भ्रम तोड़ दिया है। इजरायल से ओमान तक ईरानी मिसाइल और ड्रोन ने न केवल खाड़ी देशों बल्कि अमेरिका को भी परेशान कर रखा है। सऊदी अरब से इराक तक उसके दूतावास और ठिकानों पर ईरान की सेना ड्रोन बरसा रही है। कई एयर डिफेंस सिस्टम तबाह हो चुके हैं।

दुबई, अबूधाबी, मनामा के अलावा कुवैत और कतर में ईरानी ड्रोनों से मची तबाही को सभी ने देखा है। हालत इस कदम तक बिगड़ चुके हैं कि खाड़ी देशों के पास मिसाइल और ड्रोन इंटरसेप्टरों की भारी कमी है। अपने सहयोगी अमेरिका से मांग की है। मगर वह भी इनकी पूर्ति करने में असमर्थ है।

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ईरान की रणनीति: अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ ईरान ने सस्ते ड्रोन वाली रणनीति अपनाई। वह अपने पड़ोसी खाड़ी देशों पर इन ड्रोन से लगातार हमला कर रहा है। डर और दहशत के माहौल के इतर आर्थिक चोट भी दे रहा है। तेल ठिकानों पर हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकाबंदी के बाद खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। दुबई जैसे दुनिया के सबसे अहम आर्थिक केंद्र की इमेज को ईरान ने सिर्फ हजार डॉलर के ड्रोन से बदल कर रख दिया।

अनुमान के मुताबिक ईरान के एक शाहेद-136 ड्रोन की कीमत 20,000 से 50,000 डॉलर है। अमेरिका एक ड्रोन को मारने में पैट्रियट एयर डिफेंस जैसा डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करता है। इसकी एक मिसाइल की कीमत ही 30 लाख डॉलर (27.6 करोड़ रुपये) से अधिक है, जबकि शाहेद-136 ड्रोन भारतीय रुपये में सिर्फ 41.5 लाख रुपये का है।

ईरान एक साथ इन सस्ते ड्रोन को बड़ी संख्या में दाग सकता है। मगर पैट्रियट एयर डिफेंस इतनी बड़ी संख्या में इन्हें रोक नहीं सकता है। अगर हर ड्रोन पर 27 करोड़ की मिसाइल दागी गई तो यह आर्थिक तौर पर भी बहुत महंगा है। वहीं पैट्रियट जैसी मिसाइलों का उत्पादन करना बेहद जटिल और समय लगने वाली प्रक्रिया है। अगर युद्ध अधिक तीनों तक चला तो मिसाइलों की कमी आ सकती है। बाद में ईरान इन्हीं सस्ते ड्रोनों से और तबाही मचा सकती है। अब सवाल यह है कि इसका विकल्प क्या है?

सस्ते ड्रोन का इलाज क्या: दुनियाभर को लेजर के रूप में सस्ते ड्रोन का विकल्प दिख रहा है। मिसाइल की तुलना में इसका खर्च बेहद कम होगा। अगर एक ड्रोन को मिसाइल से मार गिराया गया तो उसकी लागत 27.6 करोड़ रुपये होगी। वहीं लेजर से यही ड्रोन महज 3.50 डॉलर यानी 325 रुपये में गिराया जा सकता है। यही कारण है कि दुनियाभर के देश लेजर तकनीक पर निवेश करने में जुटे हैं। अगर डोनाल्ड ट्रंप की माने तों अमेरिका भी जल्द अपना लेजर हथियार उतारने वाला है। दशकों से कई देश लेजर तकनीक को विकसित करने में जुटे हैं। मगर इसके रास्ते में अभी तक कई बाधाए हैं।

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लेजर हथियार के साथ समस्या क्या?

बचपन में आपने कभी न कभी आवर्धक लेंस का इस्तेमाल कागज को जलाने में किया होगा। लेजर हथियार भी इसी तरह से काम करता है। वह प्रकाश की एक बेहद शक्तिशाली किरण को एक जगह फोकस करके ड्रोन को निष्क्रिय कर देता है। सबसे जरूरी यह है कि प्रकाश की किरण का कई सेकंड तक लक्ष्य पर एक ही जगह में टिका होना जरूरी है।

अगर आसमान साफ नहीं है। बादल छाए हुए हैं तो एक ड्रोन को मार गिराने में लेजर को अधिक समय लग सकता है। कोहरा और मौसम में अधिक नमी होने पर भी यही समस्या का सामना करना पड़ेगा। धूल भरी आंधी से भी नुकसान पहुंच सकता है।

दुनिया के कुछ चुनिंदा लेजर हथियार

  • इजराइल: राफेल एडवांस्ड डिफेंस – आयरन बीम
  • ऑस्ट्रेलिया: इलेक्ट्रो ऑप्टिक सिस्टम्स- हाई एनर्जी लेजर वेपन।
  • यूक्रेन: सनरे कॉम्पैक्ट लेजर सिस्टम।
  • चीन: LY-1 सिस्टम।
  • भारत: सहस्त्र शक्ति- 30 किलो वाट।

भारत क्या सीख सकता है?

सस्ते ड्रोन दुनिया की हर बड़ी जंग में सबसे अहम भूमिका निभाएंगे। ड्रोन को रोकना मिसाइलों से ज्यादा जटिल होगा। छोटे ड्रोन बड़ी तबाही मचा सकते हैं। यह हम यूक्रेन और अब ईरान युद्ध में देख चुके हैं। भारत को न केवल सस्ते ड्रोन बनाने होंगे, बल्कि इन ड्रोन से कैसे निपटा जाए, इस पर भी फोकस करना होगा। सस्ते ड्रोन से हम दुश्मन को बड़ी चोट पहुंचा सकते हैं, लेकिन अगर दुश्मन भी ऐसे ही ड्रोन इस्तेमाल करने लगे तो उनसे निपटने की तकनीक भी हमारे पास होनी चाहिए।

हर बार एसिडिटी में गोली? न्यूट्रीशन पर पड़ सकता असर

आजकल सीने में हल्की जलन या भारीपन होते ही हम तुरंत गैस की दवा खा लेते हैं। यह दवा उस समय तो आराम दे देती है लेकिन लंबे समय तक इसका ज्यादा उपयोग सही नहीं है। हमारे पेट में एक जरूरी एसिड बनता है, जो खाने को पचाने में मदद करता है। बार-बार दवा लेने से यह जरूरी एसिड कम हो सकता है और पाचन पर असर पड़ सकता है। अगर बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं को लंबे समय तक लिया जाए, तो शरीर को अंदर से नुकसान हो सकता है। हाल ही में ब्राजील की फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ साओ पाउलो के वैज्ञानिकों की एक स्टडी में भी बताया गया है कि इन दवाओं का लगातार इस्तेमाल शरीर में जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन बिगाड़ सकता है।

अगर आपको सामान्य भाषा में समझना तो यह जान लीजिए कि जब आप रोजाना इन दवाओं का सेवन करते हैं तो पेट का pH लेवल बदल जाता है। रिसर्च बताते हैं कि पेट में एसिड की कमी होने से भोजन से मिलने वाले माइक्रोन्यूट्रिएंट्स खून में सही तरह से नहीं मिल पाते। इसका सीधा असर आपकी हड्डियों की मजबूती, मेंटल हेल्थ और एनर्जी के स्तर पर पड़ता है।

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एसिड कम होना क्यों है चिंता की बात?

ये दवाएं पेट में एसिड बनाने वाले एंजाइम को रोक देती हैं। वैसे तो एसिड जलन पैदा करता है लेकिन यही एसिड हमारे खाने से आयरन और जिंक जैसे न्यूट्रिएंट्स को सोखने में शरीर की मदद भी करता है। जब पेट में एसिड बहुत कम हो जाता है तो शरीर खाने से जरूरी पोषण नहीं ले पाता।

रिसर्च के अनुसार, मिनरल्स में कमी का सीधा असर हमारी इम्यून सिस्टम पर पड़ता है। शरीर की कोशिकाएं कमजोर होने लगती हैं जिससे बीमारियों से लड़ने की ताकत घट सकती है।

पेट का एसिड भोजन से B12 को अलग करने में मदद करता है। एसिड कम होने से इसकी कमी हो जाती है, जिससे थकान और नसों में कमजोरी महसूस हो सकती है। अगर आपके शरीर में कैल्शियम को पूरी तरह से काम करना है तो इसके लिए एसिडिक जरिए की जरूरत होती है।

लंबे समय तक एसिड की दवा लेने से ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। खून में मैग्नीशियम की कमी से मांसपेशियों में ऐंठन और रेगुलर हर्ट रेट में समस्याएं हो सकती हैं।

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बचाव के तरीके

  • लाइफस्टाइल में बदलाव: एक साथ पूरा खाना खाने के बजाय छोटे-छोटे ब्रेक लेकर खाएं।
  • प्रोबायोटिक्स: दही और छाछ जैसे चीजों को शामिल करें जो नेचुरल तरीके से डाइजेशन को ठीक करते हैं।
  • सोने का समय: रात के खाने और सोने के बीच कम से कम 3 घंटे का अंतर रखें।
  • एसिडिटी की दवाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के न लें।

पाकिस्तान का कटास राज मंदिर, सतघरा मंदिरों का इतिहास जानिए

भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं। खासकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कई प्राचीन हिंदू मंदिर आज भी मौजूद हैं। ये मंदिर हजारों साल पुराने हैं और लोगों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध मंदिर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित कटास राज मंदिर है। यह मंदिर अपनी प्राचीन वास्तुकला और धार्मिक महत्व के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस मंदिर परिसर में कई अन्य प्राचीन मंदिर भी शामिल हैं, जो हजारों साल पुराने बताए जाते हैं।

कटास राज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल जिले में स्थित है। लगभग 2000 साल पुराने इस मंदिर समूह को किला कटास भी कहा जाता है। माना जाता है कि इसका निर्माण हिंदू शाही काल में हुआ था। इसकी बनावट, गुंबद और स्थापत्य शैली आज भी उस समय की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।

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कटास राज मंदिर और मान्यता

इस्लामाबाद से दो घंटे की दूरी पर है पोथोहर पठार, जहां कटास राज मंदिर की स्थापना की गई। यहां की सबसे खास बात यहां मौजूद पवित्र तालाब (कुंड) है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती के वियोग में विलाप कर रहे थे, तब उनके आंसुओं से दो तालाब बने थे, जिनमें से एक यहां कटास राज में स्थित है।

वहीं, एक अन्य मान्यता यह भी है कि महाभारत काल में पांडवों ने अपने वनवास के 12 साल यहीं बिताए थे और ‘सतघरा’ मंदिरों का निर्माण किया था। साथ ही यह भी कहा जाता है कि यहीं युधिष्ठिर ने यक्ष के कठिन सवालों के उत्तर दिए थे।मंदिर जिसे किला कटास के नाम से भी जाना जाता है, कई हिंदू मंदिरों का एक कॉम्प्लेक्स है जो एक-दूसरे से वॉकवे से जुड़े हुए हैं।

पंजाब क्षेत्र में ज्वालामुखी के बाद इसे हिंदुओं का दूसरा सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। यहां की ऐतिहासिक बनावट और धार्मिक जुड़ाव को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने साल 2006 और 2017 में इसके मरम्मत का काम भी करवाया था। आज भी महाशिवरात्रि जैसे बड़े त्योहारों पर भारत से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

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इतिहास और संरक्षण की चुनौतियां

इतिहासकारों के लिए इस परिसर का सही समय बताना मुश्किल रहा है लेकिन अनुमान है कि ये मंदिर 7वीं शताब्दी के आसपास के हो सकते हैं। बंटवारे के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर ने काफी उपेक्षा झेली। औद्योगिक गतिविधियों और सीमेंट फैक्ट्रियों की वजह से यहां की पवित्र झील सूखने लगी थी।

हालांकि, 2017 में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने न केवल फैक्ट्रियों पर जुर्माना लगाया बल्कि झील को दोबारा भरने और मंदिर के मरम्मत के सख्त निर्देश भी दिए।

राजनयिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, पाकिस्तान अब भारतीय तीर्थयात्रियों को यहां आने की अनुमति दे रहा है। साल 2024 में भी महाशिवरात्रि के लिए 112 भारतीय नागरिकों को वीजा जारी किया गया था जो पिछले साल की तुलना में दोगुनी थी।

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

दिल्ली-NCR में मौसम का बड़ा बदलाव: तेज हवाओं और गरज-चमक के साथ बारिश

News Desk

दिल्ली में पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता से अभी मौसम सुहावना बना रहेगा। 18 मार्च के बाद एक बार फिर से मौसम करवट लेने जा रहा है। मौसम विभाग ने इस सप्ताह चार दिन गरज चमक और तेज हवाओं के साथ बारिश की चेतावनी दी है। मौसम विभाग का अनुमान है कि बृहस्पतिवार, शुक्रवार, रविवार और सोमवार को अलग-अलग इलाकों में तेज हवा के साथ बारिश हो सकती है। इससे तापमान में गिरावट आएगी।

मौसम विभाग के अनुसार, 28 मार्च को छोड़कर 26, 27, 29 और 30 मार्च को हवा की गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा रहने का अनुमान है। वहीं, मौसम विभाग की ओर से साझा किए गए ताजा अपडेट के अनुसार, इस सप्ताह 30 मार्च तक मौसम में उतार चढ़ाव देखा जाएगा। मौसम ज्यादातर गीला रहने से तापमान में भी किसी बड़े उछाल की संभावना नहीं है।
बुधवार को दिनभर तेज धूप के चलते लोगों को गर्मी का अहसास हुआ। हालांकि, हवा चलने से मौसम खुशनुमा रहा। लेकिन, सुबह से ही निकल रही धूप ने लोगों को खासा परेशान किया हुआ है। इस दौरान अधिकतम तापमान 33.5 और न्यूनतम तापमान 16.4 डिग्री दर्ज हुआ। दिल्ली में अधिकतम आर्द्रता 94 प्रतिशत और न्यूनतम आर्द्रता 33 प्रतिशत रही।

मौसम विभाग के अनुसार, रिज में 34, आया नगर में 33.7, लोधी रोड में 33.8 और पालम में 31.9 अधिकतम पारा दर्ज किया गया। मौसम विभाग के अधिकारियों ने पहले ही ऐसी संभावना जताई थी, क्योंकि पहाड़ों पर लगातार बर्फबारी हो रही है। मौसम में आए इस बदलाव की वजह पश्चिमी विक्षोभ को बताया जा रहा है।

गैस-तेल छोड़िए… एक और संकट आने वाला है; ईरान युद्ध ने बदले समीकरण

ईरान युद्ध ने दुनियाभर में ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों का यातायात सामान्य नहीं है। ईरान के हमलों के कारण खाड़ी के कई देशों ने ईंधन का उत्पादन बंद कर दिया है। असर यह है कि मांग और पूर्ति में भारी अंतर पैदा हो गया है। अमेरिका लगातार ईरान को धमकी देने में जुटा है, ताकि होर्मुज को खुलवाया जा सके। मगर ईरान झुकने को तैयार नहीं है। वहां से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया जा रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से तेल और गैस के अलावा एक और संकट खड़ा होने वाला है। शायद दुनिया की निगाह इस पर बहुत ही कम गई है।

मध्य पूर्व के समुद्री मार्ग पर आई रुकावट से दुनियाभर में सल्फर (गंधक) का बड़ा खतरा पैदा होने की आशंका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बीच ड्रोन और मिसाइल के बारिश के कारण कोई भी जहाज कंपनी वहां से गुजरने का जोखिम नहीं उठा रही है। यहां से दुनियाभर में करीब 20 फीसद तेल और 20 फीसद ही प्राकृतिक गैस का निर्यात होता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते ही दुनिया को सल्फर का एक बड़ा हिस्सा मिलता है। जहाज का आवागमन ठप होने से दुनिया के सामने सल्फर का संकट खड़ा हो सकता है।

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एक आंकड़े के मुताबिक दुनियाभर का करीब 41 फीसद सल्फर का व्यापार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते होता है। ईरान युद्ध के बाद इसकी कीमतों में लगभग 25 फीसद का इजाफा हो चुका है। मध्य पूर्व में दुनिया का 24 फीसद सल्फर का उत्पादन होता है। दुनियाभर में सल्फर से ही सल्फ्यूरिक एसिड का निर्माण किया जाता है। अमेरिका अपनी जरूरत का सल्फर खुद ही उत्पादित करता है। वह अपने 90 फीसद सल्फर का इस्तेमाल सल्फ्यूरिक एसिड बनाने में करता है। मगर कई देश अन्य देशों पर से आने वाले सल्फर पर निर्भर हैं। सल्फर संकट से इन देशों के औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगेगा, क्योंकि कोई देश औद्योगिक तौर पर कितना प्रगतिशील है, इसका अनुमान उसके सल्फ्यूरिक एसिड बनाने की क्षमता से लगता है।

ताबा संकट: बिना सल्फ्यूरिक एसिड के शुद्ध तांबा नहीं बन सकता है। खाना से निकला अयस्क अपने साथ कई अशुद्धियां समेटे होता है। सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल करके शुद्ध तांबे को अलग किया जाता है। बाद में इसी तांबे का इस्तेमाल पावरग्रिड, ट्रांसफार्मर और मोटारों में किया जाता है। अगर सल्फर की सप्लाई चेन में रुकावट आई तो दुनिया भर में तांबा संकट पैदा होगा और बाद में यह बिजली व्यवस्था में व्यवधान के तौर पर बदल सकता है, जिससे दुनियाभर में गैस और तेल के बाद बिजली संकट भी पैदा हो सकता है।

तांबे का इस्तेमाल संचार हार्डवेयर, सैन्य अड्डों और रक्षा कारखानों को चलाने में भी खूब होता है। पायने इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के मुताबिक बहरीन और कतर में दो प्रमुख अमेरिकी रडार नष्ट हुए हैं। इन्हें बदलने के लिए 30 हजार किलोग्राम से ज्यादा तांबे लगेगा। अगर जॉर्डन, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई में नष्ट हुए अन्य अमेरिकी संचार उपकरणों, सेंसरों और रडारों की मरम्मत की जाए तो हजारों किलो और तांबे की जरूरत होगी।

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सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल

  • डीएपी और एसएसपी जैसी खाद को बनाने में
  • कार और ट्रक की लेड-एसिड बैटरी में
  • पेट्रोलियम पदार्थों को साफ करने में
  • डिटर्जेंट, पेंट और दवाइयों के निर्माण में
  • पानी को शुद्ध करने में
  • सिंथेटिक फाइबर और प्लास्टिक बनाने में

कोबाल्ट संकट: सल्फ्यूरिक एसिड के बिना शुद्ध कोबाल्ट को नहीं निकाला जा सकता है। खनन से निकले कोबाल्ट के अयस्क को सल्फ्यूरिक एसिड में खोला जाता है। इससे शुद्ध कोबाल्ट अलग हो जाता है। बाद में इसी कोबाल्ट का लिथियम-आयन बैटरी में इस्तेमाल होता है। लैपटॉप, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लिथियम-आयन बैटरी का उपयोग होता है। सल्फर आपूर्ति रुकने से कोबाल्ट से लिथियम आयन बैटरी और बाद में फोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के प्रोडक्शन पर इसका असर पड़ेगा।

कोबाल्ट से विशेष मिश्रधातु का निर्माण होता है। यह धातुएं न केवल मजबूत होती हैं, बल्कि गर्मी प्रतिरोधी होती है। इन विशेष धातुओं का गैस टरबाइन, ड्रोन और जेट इंजन में किया जाता है। इसके अलावा शक्तिशाली चुंबक, पेंट, कांच और सिरेमिक व कैंसर के इलाज में काम आने वाली रेडियोथेरेपी में कोबाल्ट का इस्तेमाल होता है।

सेमीकंडक्टर: सल्फर संकट का असर सेमीकंडक्टर क्षेत्र में पड़ेगा। सिलिकॉन वेफर्स से माइक्रोचिप्स का निर्माण होता है। इन वेफर्स की सफाई और नक्काशी में बेहद शुद्ध सल्फ्यूरिक एसिड की जरूरत होती है। यही कारण है कि सल्फर की आपूर्ति में आने वाले बाधा सेमीकंडक्टर के अलावा ऑटो मोबाइल, मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम और फाइटर जेट के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि एवियोनिक्स से कंप्यूटिंग संरचना में इसका खूब इस्तेमाल होता है।

मध्य पूर्व में सल्फर का उत्पादन

मध्य पूर्व दुनियाभर का करीब 24 फीसद सल्फर का उत्पादन करता है। यानी हर चार किलो सल्फर में एक किलो यही से आता है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में मध्य पूर्व में करीब 21 से 28 मिलियन टन सल्फर का उत्पादन हुआ।

  • सऊदी अरब
  • संयुक्त अरब अमीरात
  • कतर
  • इराक

दुनिया के 10 सबसे बड़े सल्फर उत्पादक

दुनियाभर में सल्फर का उत्पादन खदानों से बेहद कम होता है। 90 फीसद तक सल्फर का उत्पादन तेल और गैस रिफाइनिंग से बाय-प्रोडक्ट के तौर पर होता है। चीन दुनिया में सबसे अधिक सल्फर बनाता है।

  • चीन
  • अमेरिका
  • रूस
  • कनाडा
  • संयुक्त अरब अमीरात
  • सऊदी अरब
  • जर्मनी
  • जापान
  • भारत
  • कजाखस्तान

दिल्ली में कबतक ठंडा रहेगा मौसम? IMD ने 21 मार्च तक का बताया हाल

दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में 15 मार्च को अचानक मौसम बदल गया, जिससे अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान में भारी गिरावट देखने को मिली। जहां लोग मान चुके थे कि गर्मियां आ चुकी हैं और सूरज अपनी गर्मी का अहसास भी करवाने लगा था, ऐसे में रविवार को हुई बारिश ने मौसम में एक बार फिर से ठंडक ला दी।

उत्तर प्रदेश में रविवार सुबह नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, अयोध्या समेत 15 शहरों में तेज हवाओं के साथ हल्की बारिश हुई। लखनऊ में बूंदाबांदी के साथ धूलभरी आंधी चली। आसमान में काले बादल छा गए। यही सिलसिला सोमवार को भी जारी रहा और कई शहरों और जिलों में तेज हवाएं चल रही हैं।

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दिल्ली-एनसीआर का सुहावना मौसम

दिल्ली-एनसीआर में पश्चिमी विक्षोभ की वजह से आज भी सुबह से ही मौसम सुहावना है। सौमवार को भी 30 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलीं। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बताया है कि दिल्ली-एनसीआर में 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चली हैं। यही नहीं बारिश की वजह से अधिकतम तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस गिरावट दर्ज की गई है, जबकि न्यूनतम तापमान में भी 3-4 डिग्री सेल्सियस गिरावट हुई है।

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21 मार्च तक के मौसम का पूर्वानुमान

मौसम विभाग ने 21 मार्च तक के मौसम का पूर्वानुमान जारी किया है, जिसमें मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इसमें बताया गया है कि 21 मार्च तक दिल्ली-एनसीआर में ठंडक बनी रहेगी और लोगों को अभी फिलहाल गर्मी से राहत मिलेगी।

मौसम विभाग ने सोमवार को अपने ताजा बुलेटिन में जानकारी देते हुए बताया कि पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, सिक्किम, असम और मेघालय, त्रिपुरा में रात का न्यूनतम तामपान 14-18 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा। इसका साफ मलतब है कि इन राज्यों में रात का मौसम सुहावना हो रहा है। गर्मी को अभी थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।

गीजर की अनदेखी से बढ़ सकती हैं स्किन परेशानियां

सर्दियों के मौसम में गर्म पानी से नहाना बहुत सुकून देता है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके गीजर के अंदर क्या चल रहा है? लंबे समय तक सफाई न होने के कारण गीजर के टैंक में कैल्शियम, मैग्नीशियम और जंग की एक मोटी परत जमा हो जाती है। यह जमा हुआ पानी गीजर की क्वालिटी को खराब कर देता है जिससे नहाते समय आपकी स्किन सीधे हानिकारक तत्वों के संपर्क में आती है।

जब गीजर के अंदर का पानी महीनों तक जमा रहता है और टैंक की सफाई नहीं होती तो इस वजह से वह बैक्टीरिया जैसे लेजियोनेला के पनपने का ठिकाना बन जाता है। गीजर का गंदा पानी स्किन के नेचुरल ऑयल को सोख लेता है जिससे स्किन बैरियर कमजोर हो जाता है। नतीजा यह होता है कि नहाने के बाद आपको स्किन में खिंचाव, सूखापन और रैशेज महसूस होने लगते हैं।

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स्किन की प्रॉब्लम

लगातार खुजली और सूखापन: टैंक में जमा हार्ड वॉटर मिनरल्स स्किन को रूखा बना देते हैं। इससे नहाने के तुरंत बाद खुजली शुरू हो जाती है।

एक्जिमा और सोरायसिस का बढ़ना: यदि आपको पहले से कोई स्किन क प्रॉब्लम है तो गंदा गर्म पानी उसे और अधिक गंभीर बना सकता है।

मुंहासे और ब्रेकआउट्स: गंदे पानी के बैक्टीरिया स्किन के छेद को बंद कर सकते हैं, जिससे शरीर पर दाने या मुंहासे हो सकते हैं।

सांस संबंधी बिमारियां

लीशियोनेयर्स रोग: यह फेफड़ों का इंफेक्शन है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, खांसी और मांसपेशियों में दर्द शामिल है।

पोंटियाक बुखार: यह एक हल्का फ्लू जैसा इंफेक्शन है जो गंदे पानी के बैक्टीरिया के कारण होता है।

अन्य समस्याएं

बालों का झड़ना: सिर्फ स्किन ही नहीं, गीजर का भारी और गंदा पानी बालों को बेजान बनाकर उनके झड़ने की रफ्तार बढ़ा देता है।

एलर्जिक डर्मेटाइटिस: पानी में मौजूद जंग और मेटल के कण स्किन पर लाल चकत्ते और जलन पैदा कर सकते हैं।

गंदे पानी के संपर्क में आने से आंखों में जलन, लालिमा और खुजली हो सकती है।

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बचाव के उपाय

  • हर सीजन की शुरुआत में प्रोफेशनल मैकेनिक से गीजर के टैंक की सफाई जरूर करवाएं।
  • मैग्नीशियम एनोड रॉड बदलें: यह रॉड टैंक को जंग से बचाती है। इसे हर 1-2 साल में बदलना चाहिए।
  • तापमान पर नियंत्रण: पानी को बहुत ज्यादा गर्म न करें, क्योंकि इससे स्केलिंग तेजी से होती है। गीजर का तापमान कम से कम 60°C पर सेट करें ताकि बैक्टीरिया पनपे ना।
  • यदि पानी का रंग पीला या मटमैला दिख रहा हो, तो तुरंत सफाई करवाएं।

अयोध्या में राम मंदिर तो बन गया, अब अधूरा क्या है? मिल गया जवाब

अयोध्या के राम मंदिर परिसर में अब राम मंदिर आंदोलन के दौरान बलिदान देने वाले कार सेवकों के लिए स्मारक और पुराने राम मंदिर से जुड़े स्मारक को विकसित करने का काम किया जा रहा है। कारसेवकों के लिए बने स्मारक का काम मार्च तक पूरा हो जाएगा, अप्रैल तक, उस जगह, जहां रामलला ‘विराजमान’ हुए थे, उसे बना लिया जाएगा। श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया है कि अभी सिर्फ दो स्थलों का निर्माण चल रहा है।

कारसेवकों के स्मारक और पुराने मंदिर, दोनों को स्मारक के तौर पर संरक्षित किया जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई है कि दोनों काम जल्द ही पूरे होने वाले हैं। नृपेंद्र मिश्रा ने कहा है कि उम्मीद है कि 31 मार्च या 30 अप्रैल तक ये काम खत्म हो जाएंगे। कारसेवकों का स्मारक करीब 11 मीटर ऊंचा है। अस्थाई मंदिर को वंशी पहाड़पुर के लाल पत्थरों से विकसित किया जाएगा। करीब 70 फीसदी तक काम पूरा हो चुका है।

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मंदिर परिसर के म्यूजियम में क्या होगा?

मंदिर परिसर में म्यूजियम भी बन रहा है, जिसमें कुल 20 गैलरी होंगी। इनमें राम जन्मभूमि आंदोलन और भगवान राम से जुड़ी कहानियां दिखाई जाएंगी। अभी इन गैलरियों के लिए विषय चुना जा रहा है। म्यूजियम में आम श्रद्धालुओं को सितंबर के बाद सीमित संख्या में जाने की अनुमति दी जा सकती है।

नृपेंद्र मिश्रा,राम जन्मभूमि मंदिर कंस्ट्रक्शन समिति, अध्यक्ष:-
अभी हम जिस मुख्य निर्माण की देखरेख कर रहे हैं, वह खास तौर पर स्मारक और पुराना मंदिर है, जहां भगवान विराजमान थे। उसे एक स्मारक के तौर पर रखा जाएगा। ये दोनों अभी बन रहे हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि यह 31 मार्च या 31 अप्रैल तक पूरा हो जाएगा।

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रामलला दरबार, राम मंदिर। Photo Credit: Ram Janmbhoomi

कब सभी जगह दर्शन कर सकेंगे श्रद्धालु?

नृपेंद्र मिश्रा,राम जन्मभूमि मंदिर कंस्ट्रक्शन समिति, अध्यक्ष:-

अभी, म्यूजियम की 20 गैलरी में दिखाए जाने वाले कंटेंट के लिए एक स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। मैं रिक्वेस्ट करूँगा कि सितंबर के बाद आम विज़िटर्स को लिमिटेड बेसिस पर म्यूज़ियम आने दिया जाए… यह तय किया गया है कि 19 मार्च को प्रेसिडेंट के दौरे के बाद, भक्तों को शुरू में पास सिस्टम के ज़रिए सभी जगहों पर जाने दिया जाएगा।

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राम मंदिर में और क्या चल रहा है?

नृपेंद्र मिश्रा ने कहा, ‘संग्रहालयों में जाने के लिए सामान्य रूप से कोई पास नहीं बनाया जाएगा। सबको मौका मिलेगा। कुछ जगहों के लिए पास बनाया जा सकता है। जैसे हनुमान जी की गैलरी है। अगर कोई वहां जाएगा तो 12 मिनट की पूरी कहानी दिखाई जाएगी। उसके बैठने की व्यवस्था की जाएगी। जितनी सीटें होंगी, उतने ही लोग जा सकेंगें।’

हनुमान गैलरी में क्या होगा खास?

राम मंदिर परिसर में ही हनुमान पर केंद्रित एक गैलरी है। उसे IIT चेन्नई की ओर से तैयार किया जा रहा है। 30 सितंबर तक इसका काम पूरा हो जाएगा। तब लोग जा सकेंगे।

कब पूरा मंदिर घूम सकेंगे श्रद्धालु?

नृपेंद्र मिश्रा ने बताया है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 19 मार्च को अयोध्या आने वाली हैं। उनके दौरे के बाद पहले पास सिस्टम से श्रद्धालुओं को सभी जगहों पर जाने की इजाजत मिलेगी। श्रद्धालु ‘रामलला’ के साथ-साथ अब म्यूजियम और अन्य स्थलों का भी दौरा कर सकेंगे। उन्होंने कहा है कि मार्च-अप्रैल तक कुछ अहम फैसले लिए जाएंगे, जिसके बाद म्यूजियम और अन्य सुविधाएं धीरे-धीरे आम श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगी।

‘ईरान जलाने चले थे ट्रंप, खुद झुलसे…’, अमेरिका से चूक कहां हुई? इनसाइड स्टोरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर बड़ा हमला शुरू किया, जिसे ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया गया। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत कई बड़े नेता मारे गए। अमेरिका और इजरायल का मानना था कि इससे ईरान की सरकार कमजोर हो जाएगी और कोई अमेरिका के इशारों पर नाचने वाला नेता आ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

हमले के बाद ईरान ने और ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया। ईरान ने नए सुप्रीम लीडर के रूप में अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को चुना। वह अपने पिता से कहीं ज्यादा कट्टर और सख्त हैं। ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से मध्य पूर्व में कई जगहों पर हमले किए। अमेरिका के ज्यादातर सैन्य बेस या तो तबाह हो चुके हैं, या उन्हें बड़ा नुकसान पहुंचा है। तेल टैंकरों पर ईरान भीषण हमले कर रहा है, आरामको जैसे तेल प्लांट तक प्रभावित हो चुके हैं।

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ईरान की रहम पर दुनिया के कई देश

ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकर और व्यापारिक जहाजों को अब गुजरने नहीं दे रहा है। पूरी दुनिया, अब ईरान की रहम पर निर्भर है। होर्मुज से दुनिया का 20 फीसदी तेल गुजरता है, वहां अब ईरान का पूरा नियंत्रण है। दुनिया में तेल की कीमतें बहुत बढ़ गईं है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में गैस संकट पैदा हो रहा है।

2 दिन में ईरान का सरेंडर चाहते थे ट्रंप, खुद सरेंडर मोड में

अमेरिका को उम्मीद थी कि यह युद्ध कुछ हफ्तों में खत्म हो जाएगा, लेकिन अब यह खुला युद्ध बन गया है। अमेरिकी सेना को ज्यादा नुकसान हुआ है। 13 सैनिक मारे गए और 140 घायल हुए हैं। अमेरिका में जनता युद्ध के खिलाफ है और गैस की कीमतें बढ़ने से ट्रंप की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई और उनके सहयोगियों की जानकारी देने पर 1 करोड़ डॉलर का इनाम घोषित किया है लेकिन वह बुरी तरह फंस गए हैं। अमेरिका, इस जंग का मकसद ही साबित नहीं कर पाएगा। अब वह फ्रांस और जापान जैसे देशों से मदद के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं।

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Mojtaba Khamenei
ईरान में मोजतबा खामेनेई की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। Photo Credit: PTI

डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका:-
कई देश, खासकर वे जो ईरान के होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने से प्रभावित हैं, अमेरिका के साथ मिलकर, इस स्ट्रेट को खुला और सुरक्षित रखने के लिए अपने युद्धपोत भेजेंगे। हमने ईरान की 100 फीसदी सैन्य क्षमता को पहले ही नष्ट कर दिया है। उनके लिए एक-दो ड्रोन भेजना, कोई माइन गिराना या इस स्ट्रेट के आस-पास या इसके अंदर कहीं भी कम दूरी की मिसाइल दागना आसान है, भले ही वे कितनी भी बुरी तरह से हार गए हों। उम्मीद है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देश, जो इस परेशानी से जूझ रहे हैं, इस क्षेत्र में अपने जहाज भेजेंगे, जिससे होर्मुज में अब उस देश की ओर से कोई खतरा न रहे, जिसकी सैन्य शक्ति पूरी तरह से खत्म हो चुकी है।

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अमेरिका में ही डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को लेकर आलोचना झेल रहे हैं। Photo Credit: PTI

ईरान को कम आंक गए बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप

ट्रंप प्रशासन ने खुफिया जानकारी के आधार पर जल्दी हमला किया, जिससे ईरान के सभी बड़े नेता एक साथ मारे जाएं। लेकिन हमले इतने बड़े थे कि जिन लोगों को अमेरिका ईरान का नया लीडर बनाने की उम्मीद कर रहा था, वे भी मारे गए। डोनाल्ड ट्रंप ने खुद माना कि जिन्हें हम चाहते थे, वे मर गए। अब नए लीडर मोजतबा खामेनेई हैं, जो बदला लेने की बात कर रहे हैं। वह खून का बदला खून से ही चाहते हैं।

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ईरान की ताकत कैसे नहीं समझ सके ट्रंप

ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया। अमेरिका दावा करता रहा कि आप लोग रिस्क पर अपने जहाज को ले जाइए, अमेरिकी जहाज रेस्क्यू करेंगे। सच यह है कि अमेरिका खुद जहाज उतरने से डर रहा हैं। अमेरिका के कई जहाज ईरान ने मार गिराए हैं। दुनिया का 20 फीसदी तेल जहां से गुजरता है, वहीं ईरान अपने सबसे हिंसक रूप में है।

ईरान ने तेल टैंकरों पर हमले किए, कई टैंकर जले। अमेरिका ने भी जोर आजमाइश की। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। अमेरिका में पेट्रोल 3.63 डॉलर प्रति गैलन हो गया।

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का पूरा कंट्रोल ईरान के पास है। Photo Credit: PTI

अमेरिका ने खार्ग द्वीप पर बमबारी की, जो ईरान का मुख्य तेल निर्यात केंद्र है। अमेरिका के हमलों से ईरान और सख्त हो गया है। अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का खुलना मुश्किल है। नौसेना से जहाजों की सुरक्षा की बात चल रही है, लेकिन अमेरिका फारस की खाड़ी में फिसड्डी साबित हुआ है।

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बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दुनियाभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। Photo Credit: PTI

ईरान नहीं, अमेरिका करेगा सरेंडर?

डोनाल्ड ट्रंप हारकर भी अपनी जीत की दावेदारी पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि जंग जल्द खत्म हो जाएगी, लेकिन उनके मंत्री यह बात मानने को तैयार नहीं है। मार्को रुबियो और पीट हेगसेथ ने बार-बार कहा है कि जंग खत्म होने में 4-6 हफ्ते लग सकते हैं।

अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स पहले से नाराज हैं। डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक सांसद भी नाराज हैं क्योंकि कोई साफ योजना नहीं दिख रही है। अमेरिका के पास ईरान की ऐसी दुविधापूर्ण नीति, पहले की किसी भी सरकार में नहीं रही। अमेरिका के सहयोगी देश जैसे जर्मनी और कतर चिंतित हैं। क्षेत्र में अमेरिकी नागरिकों को निकालने की नौबत आ गई है। ईरान ने पड़ोसी देशों पर लगातार हमले किए हैं।

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अब आगे क्या रास्ता है?

डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका:-
अमेरिका समुद्र तट पर जोरदार बमबारी करेगा। लगातार ईरानी नावों और जहाजों को पानी में ही तबाह करता रहेगा। किसी भी तरह से, हम जल्द ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला, सुरक्षित और मुक्त करवा लेंगे।

अमेरिका, ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल, नौसेना और न्यूक्लियर प्रोग्राम को खत्म करना चाहता है। ईरान मजबूती से टिका हुआ है। युद्ध लंबा खिंच सकता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के पास ईरान के लिए कोई साफ नीति नहीं है। वह खुद कह रहे हैं कि जब तक मुझे लगेगा, जंग जारी रहेगा। उनके इस रवैये से पड़ोसी और सहयोगी देश फंसे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की वजह से पश्चिम एशिया जल रहा है और आग की लपटें में खुद अमेरिका जल रहा है।

मंत्री हरदीप पुरी की बेटी ने एपस्टीन फाइल को लेकर दायर किया मानहानि का केस

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हिमायनी पुरी ने दिल्ली हाई कोर्ट में मानहानि का केस दायर किया है। उन्होंने जेफरी एपस्टीन से जुड़े आरोपों वाली ऑनलाइन खबरें, पोस्ट, वीडियो और दूसरे कंटेंट को हटवाने की मांग की है। हिमायनी ने 10 करोड़ रुपये का हर्जाना मांगा है। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों और अज्ञात लोगों के खिलाफ स्थायी रोक लगाने की गुहार लगाई है। उन्होंने दुनिया भर के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ये सामग्री हटवाने का आदेश मांगा है।

उन्होंने एक्स, गूगल, मेटा (फेसबुक-इंस्टाग्राम) और लिंक्डइन जैसी कंपनियों से कहा है कि अगर भविष्य में ऐसे ही झूठे और मानहानिकारक आरोप उनके नोटिस में आएं, तो उन्हें तुरंत हटा दिया जाए। कोर्ट में यह केस जल्द ही, शायद मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो सकता है।

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सोशल मीडिया के खिलाफ आरोप

हिमायनी के मुताबिक, 22 फरवरी 2026 से सोशल मीडिया पर कई जगहों पर उनके खिलाफ आरोप लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उनका जेफरी एपस्टीन से सीधा या अप्रत्यक्ष व्यापारिक, आर्थिक, निजी या कोई और संबंध था। साथ ही उनके अपराधों से जुड़े थे।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया गया कि जहां हिमायनी काम करती थीं, रियल पार्टनर्स एलएलसी (Realm Partners LLC) को एपस्टीन या उनके साथियों से फंडिंग, आर्थिक फायदा या गलत तरीके से पैसे मिले थे। रॉबर्ट मिलार्ड नाम के व्यक्ति के साथ मिलकर उन्होंने एक बड़े बैंक लेहमन ब्रदर्स को गिराने में भूमिका निभाई थी।

कहा- आरोप दुर्भावनापूर्ण हैं

हिमायनी का कहना है कि ये सभी आरोप पूरी तरह झूठे, दुर्भावनापूर्ण हैं और इनके खिलाफ किसी भी प्रकार का कोई सबूत नहीं है। उनके केस में लिखा है कि कुछ लोग (डिफेंडेंट नंबर 1 से 14 और कई अज्ञात लोग) ने जानबूझकर ये झूठी बातें फैलाई हैं। वे एडिटेड वीडियो, गुमराह करने वाले कैप्शन और फर्जी थंबनेल इस्तेमाल करके लोगों में गुस्सा भड़काना चाहते हैं। इससे सोशल मीडिया पर वायरल होकर उनके सम्मान को ठेस पहुंची है।

केस में कहा गया है कि उन्हें भारत और दुनिया भर में एक सोची-समझी साजिश के तहत निशाना बनाया जा रहा है। सिर्फ इसलिए क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हैं।

जेठमलानी ने तैयार किया केस

केस में यह भी लिखा है कि हिमायनी एक बहुत सफल और खुद पर निर्भर प्रोफेशनल महिला हैं लेकिन सिर्फ उनके पिता के कैबिनेट मंत्री होने की वजह से उन पर इतनी बुरी तरह से हमला किया जा रहा है।

यह केस सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने तैयार किया है। इसे लेक्सस्टर लॉ एलएलपी के वकीलों शांतनु अग्रवाल, मधुलिका राय शर्मा, मनस अरोड़ा और सैयद हमजा गयूर ने दायर किया है।

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यह मामला सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों और राजनीतिक कारणों से जुड़ा दिखता है, जहां कई लोग बिना सबूत

के आरोप लगा रहे हैं।

झड़ते बालों की समस्या से हैं परेशान, ऐसे करें मोरिंगा का इस्तेमाल, मिलेगा फायदा

खराब लाइफस्टाइल की वजह से बाल रूखे और बेजान नजर आते हैं। साथ ही हम केमिकल्स वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं जो बालों से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा देते हैं। अगर आप बाल झड़ने की समस्या से परेशान हैं तो मोरिंगा का इस्तेमाल कर सकते हैं। मोरिंगा को हिंदी में सहजन कहा जाता है। यह सिर्फ सेहत के लिए ही नहीं बालों के लिए भी बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसमें आयरन की भरपूर मात्रा होती है जो ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है।

मोरिंगा में विटामिन ए और ई की भरपूर मात्रा होती है जो स्कैल्प को मजूबत करने में मदद करता है। इसके अलावा जिंक और एमिनो एसिड पाया जाता है। आप बालों के झड़ने की समस्या से परेशान हैं तो मोरिंगा के तेल या मास्क का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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झड़ते बालों के लिए कैसे फायदेमंद है मोरिंगा?

बाल झड़ने की समस्या से परेशान हैं तो आप मोरिंगा के तेल, पाउडर और मास्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। आइए जानते हैं आप मोरिंगा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

मोरिंगा ऑयल

मोरिंगा का ऑयल लगाकर आपको 10 मिनट तक मसाज करना है और फिर एक लिए 1 घंटे के लिए छोड़ दें। इसके बाद माइल्ड शैंपू और क्लींजर का इस्तेमाल करें। इससे बालों में चमक आएगी। साथ ही रूखेपन की समस्या से भी छुटकारा मिलता है।

मोरिंगा पाउडर

बालों के लिए हेल्दी बनाने के लिए मोरिंगा पाउडर का इस्तेमाल करें। इसमें फाइटोकेमिकल्स, विटामिन सी, ए और ई, आयरन और जिंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है। मोरिंगा का पाउडर बालों की क्वालिटी को सुधारता है।

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मोरिंगा हेयर मास्क

अगर आपको डैंड्रफ की समस्या है तो मोरिंगा का हेयर मास्क लगाए। हेयर मास्क बालों के लिए बहुत फायदेमंद है। मोरिंगा हेयर मास्क बनाने के लिए आपको 4 चम्मच मोरिंगा पाउडर में 2 चम्मच दही और 1 चम्मच शहद मिलाकर पेस्ट तैयार कर लेना है। इस हेयर मास्क को बालों में 30 से 40 मिनट तक लगाकर रखें। इसके माइल्ड शैंपू से धो लें।

सूर्यग्रहण पर भारत में सूतक लगेगा या नहीं? सही बात जान लीजिए

साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी को लगने जा रहा है। इस बार लगने वाले सूर्य ग्रहण में ‘रिंग ऑफ फायर’ देखने का मौका मिलेगा। भारत के लोगों के लिए राहत की बात यह है कि यहां इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारतीय समय के अनुसार यह ग्रहण दोपहर में शुरू तो होगा लेकिन भारत के किसी भी हिस्से में यह दिखाई नहीं देगा।

यह ग्रहण भारत मे दिखाई नहीं दे रहा है इसलिए ज्योतिण शास्त्र के अनुसार यहां सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसका मतलब है कि देशभर के मंदिरों के कपाट खुले रहेंगे, पूजा-पाठ हमेशा की तरह होगा और रोज के कामों पर कोई पाबंदी नहीं रहेगी।

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ग्रहण का समय और अवधि

भारतीय समय के अनुसार यह सूर्य ग्रहण दोपहर से शुरू होकर शाम तक चलेगा। ग्रहण की शुरुआत दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर होगी। यह शाम 5 बजकर 42 मिनट पर अपने चरम पर रहेगा। इसी समय ‘रिंग ऑफ फायर’ दिखाई देगा। ग्रहण की समाप्ति शाम 7 बजकर 57 मिनट पर होगी। इस तरह यह पूरी घटना लगभग 4 घंटे 32 मिनट तक चलेगी।

क्या होता है ‘रिंग ऑफ फायर’?

इस बार ग्रहण में ऐसी स्थिति बन रही है जिसमें चंद्रमा, सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता जिससे सूर्य का बाहरी हिस्सा एक चमकती हुई अंगूठी यानी रिंग की तरह नजर आता है। यही कारण है कि इसे ‘रिंग ऑफ फायर’ का नाम दिया गया है। इस स्थिति को ‘वलयाकार सूर्य ग्रहण’ (Annular Solar Eclipse) कहा जाता है।

दुनिया में कहां दिखेगा यह नजारा?

भले ही हम भारत में इसे न देख पाएं लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में यह साफ नजर आएगा। इसमें अंटार्कटिका और दक्षिणी महासागर के कई इलाके, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे अफ्रीकी देश शामिल है।

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क्या करें और क्या न करें?

भले ही भारत में इसका असर नहीं है, फिर भी कुछ बातों का ध्यान रखना बेहतर है-

  • सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों जैसे कि खाना न बनाना या पानी न पीना, इन पर ध्यान न दें क्योंकि भारत में ग्रहण नहीं दिख रहा है।
  • प्रेग्नेंट महिलाएं किसी भी तरह का स्ट्रेस न लें, आपकी रूटीन सामान्य रह सकती है।
  • अगर आप चाहें तो अपनी श्रद्धा अनुसार मंत्र जाप या ध्यान कर सकते हैं, यह मानसिक शांति के लिए अच्छा है।
  • जहां ग्रहण दिख रहा है, वहां बिना सोलर फिल्टर वाले चश्मे के सूर्य को देखना आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है।

आज का दिन एक सामान्य दिन की तरह ही बीतेगा। अगर आप इस खगोलीय घटना को देखना चाहते हैं, तो साइंस चैनलों की ऑनलाइन लाइव स्ट्रीम का सहारा ले सकते हैं।

मिडिल ईस्ट में जंग, CBSE ने कहां टाल दी परीक्षा? समझ लीजिए

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने मिडिल ईस्ट के कई देशों में होने वाली कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को पूरी तरह से रद्द करने का फैसला लिया है। यह कदम अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के हालातों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को देखते हुए उठाया गया है। बोर्ड ने साफ किया है कि उनका सबसे पहला मकसद छात्रों, शिक्षकों और परीक्षा स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस फैसले के बाद अब उन देशों में कोई भी बची हुई परीक्षा नहीं होगी जो 16 मार्च से 10 अप्रैल 2026 के बीच होनी थी।

सीबीएसई का यह फैसला मिडिल ईस्ट के उन सभी देशों में लागू होगा जहां सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल मौजूद हैं। इन देशों में मुख्य रुप से बहरीन, ईरान, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हैं। इन सभी जगहों पर मोर्च-अप्रैल 2026 के सत्र में होने वाली परीक्षाएं अब नहीं कराई जाएंगी। इससे पहले भी बिगड़ते हालातों की वजह से कुछ परीक्षाओं को टाला गया था। लेकिन अब सुरक्षा को देखते हुए पूरे शेड्यूल को ही खत्म कर दिया गया है।

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पहले भी पोस्टपोन हुई थी परीक्षाएं

बोर्ड ने अपने अधिकारिक नोटिस में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जो परीक्षाएं पहले 1 मार्च, 3 मार्च, 5 मार्च, 7 मार्च और 9 मार्च 2026 को पोस्टपोन की गई थीं, वे भी अब पूरी तरह से रद्द मानी जाएंगी। इसका मतलब यह है कि अब उन पुरानी तारीखों वाली परीक्षाओं को दोबारा आयोजित करने की कोई योजना नहीं है। छात्रों को अब उन विषयों के लिए फिर से परीक्षा केंद्र पर जाने की जरूरत नहीं होगी।

कैसे करेंगे रिजल्ट का चुनाव?

परीक्षा रद्द होने के बाद अब सबसे बड़ी बात यह है कि छात्रों का रिजल्ट किस तरह तैयार होगा। सीबीएसई ने बताया है कि वे इसके लिए एक नया तरीका ढूंढ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि छात्रों को उनके पुराने रिकॉर्ड या स्कूल में हुए टेस्ट के आधार पर नंबर दिए जा सकते हैं। रिजल्ट का सही तरीका और नियम क्या होंगे इसकी जानकारी बोर्ड जल्द ही एक नए नोटिस जारी करेगी।

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छात्रों और स्टाफ की सुरक्षा

मिडिल ईस्ट में हालात बहुत खराब है जिसकी वजह से वहां स्कूल चलाना या एग्जाम लेना मुमकिन नहीं है। सीबीएसई ने यह फैसला सिर्फ इसलिए लिया है ताकि किसी भी छात्र या टीचर को कोई खतरा न हो। अब सभी स्कूलों और बच्चों को बोर्ड के अगले आदेश का इंतजार करना होगा जिससे यह पता चलेगा कि उनके फाइनल नंबर कैसे तय किए जाएंगे।

होर्मुज स्ट्रेट में क्या भारत युद्धपोत तैनात करेगा? विदेश मंत्रालय ने दिया जवाब

भारत ने अमेरिका के साथ होर्मुज स्ट्रेट में युद्धपोत भेजने पर कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं की है। यह जानकारी विदेश मंत्रालय ने सोमवार को दी। यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बीच आई है, जिसमें उन्होंने कई देशों से अपील की कि वे अपने युद्धपोत भेजकर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को सुरक्षित और खुला रखें।

ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देश, जो ईरान की वजह से प्रभावित हैं, इस क्षेत्र में युद्धपोत भेजें ताकि जलमार्ग सुरक्षित रहे लेकिन इन देशों ने अभी तक ऐसा कोई वादा नहीं किया है।

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क्या बोले जयशंकर?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से जब पूछा गया कि क्या अमेरिका ने भारत से युद्धपोत भेजने के लिए संपर्क किया है और भारत का क्या रुख है, तो उन्होंने कहा, ‘हम इस मुद्दे पर कई देशों की चर्चा से वाकिफ हैं। हमने अभी तक इसे द्विपक्षीय स्तर पर नहीं चर्चा की है।’

जायसवाल ने कहा कि भारत इस मामले पर कई पक्षों से बातचीत जारी रखेगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में भी इस पर बात की। जयशंकर ने कहा कि भारत के पास ईरान के साथ भारतीय जहाजों के लिए कोई ‘कंप्लीट व्यवस्था’ नहीं है, लेकिन तेहरान से सुरक्षित मार्ग पर को लेकर बातचीत चल रही है और यह कुछ नतीजे दे रही है।

दो जहाजों ने पार किया था स्ट्रेट

शनिवार को दो भारतीय जहाजों शिवालिक और नंदा देवी ने 92,712 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर होर्मुज स्ट्रेट पार किया। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच फोन पर बातचीत और विदेश मंत्री जयशंकर तथा ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की चर्चा के बाद हुआ।


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जानकारों का कहना है कि भारत ने लाल सागर या होर्मुज में बहुराष्ट्रीय नौसेना बल में शामिल नहीं हुआ है, लेकिन भारतीय नौसेना ने भारतीय जहाजों की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात किए हैं और अन्य देशों की नौसेनाओं के साथ समन्वय किया है।

जायसवाल ने दोहराया कि भारत और ईरान के बीच पुराने संबंध हैं और भारतीय जहाजों के सुरक्षित गुजरने के बदले भारत ने कुछ भी नहीं दिया। उन्होंने कहा, ‘यह हमारी साझेदारी का आधार है, यह कोई लेन-देन नहीं है।’

भारत ने जारी किया बयान

भारत ने इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू युद्ध पर 28 फरवरी, 3 मार्च और 9 मार्च को बयान जारी किए। जायसवाल ने कहा, ‘हम लगातार डी-एस्केलेशन, संयम बरतने और बातचीत व कूटनीति के रास्ते पर चलने की अपील करते हैं ताकि यह संघर्ष जल्द खत्म हो। हमने कहा है कि सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए।’

यूरोपीय संघ से मिले थे जयशंकर

जयशंकर ब्रुसेल्स में यूरोपीय संघ के मंत्रियों से मिलने गए हैं, जहां पश्चिम एशिया के हालात एजेंडे में ऊपर रहेंगे। जायसवाल ने कहा कि वहां प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी।

शिपिंग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने बताया कि होर्मुज के पश्चिम में फारस की खाड़ी में 22 भारतीय जहाज फंसे हैं। इनमें 6 एलपीजी कैरियर, एक एलएनजी कैरियर और 4 क्रूड ऑयल टैंकर शामिल हैं। इन पर 611 भारतीय नाविक सुरक्षित हैं, लेकिन ये कब घर लौट पाएंगे, इसकी जानकारी नहीं है।


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यह स्थिति ईरान-अमेरिका तनाव के कारण बनी है, जहां ईरान ने स्ट्रेट को बंद करने की कोशिश की, जिससे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और भारत जैसे देशों को ऊर्जा सुरक्षा की चिंता है। भारत कूटनीति से अपना हित सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है।